देवभूमि की जागृत काली...कुमाऊं रेजीमेंट की आराध्य देवी, कई युद्धों में की जवानों की रक्षा!

देवभूमि से देवों का नाता बहुत पुराना है। ये रिश्ता ऐसा है कि आम लोगों से भी जुड़ा है, तो बॉर्डर पर लड़ने वाले जवानों से भी जुड़ा है। ऐसी ही जागृत हैं महाकाली।

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सेना की एक वीर रजीमेंट..जिसकी आराध्य मां हाट कालिंका है। ये बात उतनी ही सच है जितनी की सेना के जवानों की मां को लेकर आस्था। पिथौरागढ़ जिले का गंगोलीहाट में स्थापित हाट कालिका एक शक्तिपीठ है। जो उत्तराखंड के लोगों के ही नहीं बल्कि मां शक्ति में विश्वास रखने वाले भक्तों के बीच भी काफी प्रसिद्ध है। पहाड़ों के बीच बने इस मंदिर में सालभर मां के दर्शनों के लिए लोगों का तांता लगा रहता है। खासकर सेना के जवान यहां दर्शनों के लिए आते रहते हैं। हाट कलिका देवी रणभूमि में गए जवानों की रक्षक मानी जाती है। यहां मंदिर की घंटियों में किसी न किसी आर्मी अफसर या जवान का नाम मिल जाएगा। मंदिर में साल भर आम लोगों के अलावा कुमाऊं रेजीमेंट के जवान और अफसर भी माथा टेकने पहुंचते है। कुमाऊं रेजीमेंट के हाट कालिका की देवी को अपना अराध्य मानने के पीछे एक बड़ी ही दिलचस्प कहानी है।

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कहा जाता है कि द्वितीय विश्वयुद्ध (1939-1945) के दौरान भारतीय सेना का जहाज डूबने लगा। तब सेना के अधिकारियों ने जवानों से अपने-अपने भगवान को याद करने का कहा। लेकिन सब के सामने चमत्कार तब हुआ जब कुमाऊं के सैनिकों ने हाट काली का जयकारा लगाया और वैसे ही जहाज किनारे आ गया। इस घटना के बाद से कुमाऊं रेजीमेंट ने मां काली को आराध्य देवी की मान्यता दे दी। उस वक्त से मौजूदा वक्त तक जब भी कुमाऊं रेजीमेंट के जवान युद्ध या किसी भी मौर्चें के लिए जाते हैं तो काली मां के दर्शन करना नहीं भूलते है। हर साल माघ महीने में यहां पर सैनिकों की भीड़ लग जाती है। मंदिर से जुड़ाव का एक और वाक्या है 1971 का जब, भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ और 16 दिसंबर को पाकिस्तानी सेना के एक लाख जवानों ने भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।

इस दिन को विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। सेना की विजयगाथा में हाट यह भी पढें - उत्तराखंड की बेमिसाल परंपरा, पहाड़ में पशुओं की मंगलकामना का पर्व है ‘खतड़वा’!
कालिका के नाम से विख्यात गंगोलीहाट के महाकाली मंदिर का भी गहरा नाता रहा है। कुमाऊं रेजीमेंट ने पाकिस्तान के साथ लड़ाई खत्म होने के बाद गंगोलीहाट में अपने जवानों की टुकड़ी भेजी। गंगोलीहाट के कनारागांव निवासी सूबेदार शेर सिंह के नेतृत्व में यहां आई सैन्य टुकड़ी ने हाट कालिका के मंदर में मां की मूर्ति की चढ़ाई। सेना द्वारा स्थापित ये मूर्ति मंदिर की पहली मूर्ति थी। कालिका के मंदिर में शक्ति पूजा का विधान है। इसके बाद 1994 में कुमाऊं रेजीमेंट ने ही मंदिर में महाकाली की बड़ी मूर्ति चढ़ाई है। बता दे कि कुमाऊं रेजीमेंटल सेंटर रानीखेत के साथ ही रेजीमेंट की बटालियनों में हाट कालिका के मंदिर स्थापित हैं। द्वितिय विश्व युद्ध के दौरान हाट कालिका से जुड़ा कुमाऊं रेजीमेंट का रिश्ता आज भी सेना के जवान पूरी श्रद्दा के साथ निभाते है। जवान ही नहीं यहां बड़े बड़े आर्मी के अफसर भी आकर नतमस्तक होते है।


Uttarakhand News: story of ma haat kalinka

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