उत्तराखंड रुद्रप्रयागDialects Folk Culture and Oral Traditions in Uttarakhand

उत्तराखंड: अनपढ़ पहाड़ी महिलाओं के रचे गीत गा रहे प्रोफेशनल, विरासत बची रहेगी.. पर संस्कृति?

ज्यादातर लोकगीत अनपढ़ पहाड़ी महिलाओं द्वारा रचे जाते थे, जब वे खेतों में काम करती थीं, पानी भरती थीं या लकड़ी इकट्ठा करती थीं। ये गीत उनके सुख-दुख, संघर्ष और सपनों को अभिव्यक्त करते थे..

Uttarakhandi Culture: Dialects Folk Culture and Oral Traditions in Uttarakhand
Image: Dialects Folk Culture and Oral Traditions in Uttarakhand (Source: Social Media)

रुद्रप्रयाग: पहाड़ी शादियाँ, जो कभी हल्दी हाथ, मंगल गीत जैसी विशिष्ट परंपराओं से भरी होती थीं, अब बदल गई हैं। मांगलिक कार्यों में पहले गाँव की महिलाएँ, बिलकुल सही समय पर, तुरंत सांस्कृतिक गीत गा देती थीं, अब उनकी जगह पेशेवर गायक, डीजे या मोबाइल रिकॉर्डिंग ने ले ली है।

Survival of Dialects, Folk, Culture and Oral Traditions of Uttarakhand

ऐतिहासिक रूप से, लोकगीत अनपढ़ पहाड़ी महिलाओं द्वारा रचे जाते थे, जब वे खेतों में काम करती थीं, पानी भरती थीं या लकड़ी इकट्ठा करती थीं। ये गीत उनके सुख-दुख, संघर्ष और सपनों की अभिव्यक्त थे और मौखिक परंपरा के माध्यम से पीढ़ियों के साथ आगे बढ़ते थे। आजकल पहाड़ के सुदूर गावों में भी मोबाइल की पहुंच और "ब्लॉगिंग" ने वो समय समाप्त कर दिया है जिस समय पर ये सांस्कृतिक गीत किसी महिला के मन में परिस्थितिनुसार फूट पड़ते होंगे। ब्याह-बरातों में दूल्हे या रिश्तेदारों पर बनाए गए मज़ेदार, चुटीले गीत अब लगभग भुला दिए गए हैं - यहाँ तक कि गाँवों में भी। अब तो दोपहर में शादियाँ होना आम बात हो गई हैं.. कहा जाता है कि यह कानून-व्यवस्था की स्थिति के कारण है।

बोलियों को बढ़ावा देना जरूरी

विडियो क्रिएटर संस्कृति को दोहने के अलावा कुछ खास नहीं कर रहे, उत्तराखंड में ऐसे विडियो क्रिएटर उँगलियों पर गिने जा सकते हैं जो अपनी पहाड़ी बोली में अपने विडियो बनाते हैं। बोलियाँ केवल भाषाई भिन्नताएँ नहीं होतीं - वे संस्कृतिक विरासत की संवाहक होती हैं, जो भौगोलिक, सामाजिक और ऐतिहासिक परिस्थितियों से आकार लेती हैं। इन बोलियों का संरक्षण और शिक्षण भी क्षेत्रीय लोक संस्कृति को बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है। परंपरागत रूप से, ये संस्कृतियाँ स्थानीय बोलियों की मौखिक परंपराओं के माध्यम से संरक्षित और आगे बढ़ाई जाती थीं। पहाड़ी-बोलियां बोलने वालों की संख्या कम हुई है, और इसके संरक्षण के लिए किसी प्रकार की लिपि का शिक्षण अभी दूर की कौड़ी है। बुजुर्गों के साथ इन बोलियों का शब्दकोष भी धीरे-धीरे ख़त्म हो रहा है।

मेलों-कौथिगों तक बची है संस्कृति

उत्तराखंड में आज भी समृद्ध और विविध लोक संस्कृति है, जो गाँवों के मेलों और कौथिक जैसे पर्वों में देखी जा सकती है। इस संस्कृति को जीवित रखने के लिए यह जरूरी है कि हम स्थानीय बोलियों को बढ़ावा दें। ये बोलियाँ ही लोक परंपराओं, रीति-रिवाजों और अनुष्ठानों की मूल आधारशिला हैं। यदि इन बोलियों का बोलचाल में ज्ञान समाप्त हो गया, तो मौखिक परंपराओं का संचार रुक जाएगा, जिससे एक अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर खोने का खतरा है।

वस्त्र और पहनावा हो गए राजनीतिक

कभी-कभी तो ऐसा भी लगता है कि राजनीतिज्ञों की पारंपरिक पोशाकों में छवि ने आम लोगों को इन्हें रोजमर्रा में पहनने से हतोत्साहित कर दिया है। पारंपरिक पहनावे - जैसे कि कुर्ता-पायजामा या धोती, पहाड़ों में मंदिर के पुजारियों और कुछ सांस्कृतिक ध्वजवाहकों को छोड़कर, अब आम जीवन में शायद ही कभी देखे जाते हैं। यहाँ तक कि धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजनों में भी। अब ये वस्त्र केवल शादियों या औपचारिक आयोजनों तक सीमित रह गए हैं।
(सोर्स: उत्तराखंड में बोलियाँ, लोक संस्कृति और मौखिक परंपराएं - देवेंद्र के. बुडाकोटी, एडिटेड: राज्यसमीक्षा)