उत्तराखंड की ‘लक्ष्मी’ नहीं बच पाई, विदेशी डॉक्टर भी फेल हुए..न दवा काम आई न दुआ

रिजॉर्ट से छुड़ाई गई लक्ष्मी हथिनी के पिछले 7 महीने मौत से लड़ते हुए बीते, पर अफसोस कि वो ये जंग हार गई...

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कभी पर्यटकों के बीच बेहद मशहूर रही लक्ष्मी नाम की हथिनी बच नहीं सकी। नैनीताल के रामनगर में लक्ष्मी हथिनी ने अंतिम सांस ली। पिछले सात महीने से लक्ष्मी हथिनी पैर में इंफेक्शन से जूझ रही थी। वन विभाग ने लक्ष्मी हथिनी को बचाने के लिए तमाम उपाय किए। विदेशों से दवा मंगाई, साउथ अफ्रीका के डॉक्टरों से मदद भी मांगी पर अफसोस कि लक्ष्मी बच नहीं सकी। मंगलवार रात करीब 12 बजे बेजुबान लक्ष्मी इस बेरहम दुनिया को अलविदा कह चली गई। लक्ष्मी के यूं चले जाने से वन विभाग के कर्मचारी-अधिकारी भी दुखी हैं। आपको बता दें कि हथिनी उन पालतू हथिनियों में शामिल थी, जिन्हें नैनीताल-रामनगर के रिजॉर्टों में रखा गया था। हाईकोर्ट के आदेश के बाद पिछले 9 अगस्त को वन विभाग ने इन हथिनियों को ढिकुली, मोहान और कुमेरिया के रिजॉर्ट से आजाद कराया था। सभी हथिनियों को आमडंडा में रखा गया था, जहां उनकी देखरेख की जा रही थी। इन 8 हथिनियों में से एक लक्ष्मी भी थी।

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लक्ष्मी को इनफिनिटी रिजॉर्ट से मुक्त कराया गया था। जनवरी में लक्ष्मी के पैर में इंफेक्शन हो गया था। उसके बाद लक्ष्मी एक बार जो बैठी तो फिर कभी खड़ी नहीं हो सकी। वन विभाग ने लक्ष्मी के इलाज में 40 लाख रुपये खर्च कर दिए। एसओएस मथुरा और जीपी पंतनगर यूनिवर्सिटी के साथ ही दक्षिण अफ्रीका से डॉक्टरों की टीम भी बुलाई, पर लक्ष्मी की हालत में सुधार नहीं हुआ। लक्ष्मी की सेवा करने वाले कर्मचारी उसकी मौत से दुखी हैं। वहीं जिस इनफिनिटी रिजॉर्ट से लक्ष्मी को मुक्त कराया गया था, उसने वन विभाग पर गंभीर आरोप लगाए हैं। रिजॉर्ट वालों ने कहा कि वन विभाग ने हथिनियों को गलत तरीके से हिरासत में लिया और फिर उनकी देखभाल भी नहीं की। वहीं वन अधिकारियों ने आरोपों को निराधार बताया। डीएफओ भूपेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि लक्ष्मी के इलाज के लिए दिल्ली-देहरादून तक से दवाएं मंगवाई गईं। वन विभाग ने लक्ष्मी के इलाज में कोई लापरवाही नहीं बरती।


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