जय देवभूमि...मदमहेश्वर और तुंगनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि घोषित हुई..जानिए

देवभूमि उत्तराखंड के द्वितीय केदार मदमहेश्वर और तृतीय केदार भगवान तुंगनाथ के कपाट खुलने की तिथि घोषित हो गई है। आप भी जानिए

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देवभूमि में देवताओं का वास है...यहां के चार धाम पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं, तो पंचकेदार के दरबार में हर कोई सिर झुकाता है। इस बीच द्वितीय केदार मदमहेश्वर के कपाट खुलने की तिथि घोषित हो गई है। ऊखीमठ के ओंकारेश्वर मन्दिर में विधि-विधान के साथ तिथि घोषित की गई। 17 मई को भगवान मदमहेश्वर की डोली सभा मण्डप में विराजमान होगी। 18 मई को बाबा भोलेनाथ की डोली ओंकारेवर मन्दिर में विश्राम करेगी। इसके बाद 19 मई को डोली मदमहेश्वर धाम के लिए रवाना होगी और रात्रि प्रवास को राकेश्वरी मन्दिर रांसी पहुंचेगी। इसके बाद 20 मई को डोली रात्रि प्रवास को गौण्डार गांव पहुंचेगी। इसके बाद 21 मई को मदमहेश्वर धाम के कपाट सभी भक्तों के लिए खोल दिए जाएंगे। अब आगे आपको बताते हैं कि तृतीय केदार भगवान तुंगनाथ के कपाट किस दिन खुलेंगे...आगे पढ़िए

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तृतीय केदार भगवान तुंगनाथ के कपाट खोलने की तिथि भी घोषित हो गई है। तय हुआ है कि 8 मई को मक्कूमठ में मुखणी मेला लगेगा। 9 मई को डोली तुंगनाथ धाम को रवाना होगी और रात्रि प्रवास के लिए चोपता पहुंचेगी। इसके बाद 10 मई को तुंगनाथ धाम के कपाट भक्तों के लिए खुल जाएंगे। तुंगनाथ धाम की गिनती दुनिया के सबसे ऊँचे शिवालय में होती है। करीब 3,680 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस शिवालय को विश्व का सबसे ऊंचा शिवालय माना जाता है। तकरीबन 1000 साल पुराना तुंगनाथ मंदिर केदारनाथ और बद्रीनाथ मंदिर के बीचों-बीच स्थित है।इस मंदिर के निर्माण के बारे में ऐसी मान्यता है कि द्वापर युग में महाभारत के युद्ध के दौरान हुए विशाल नरसंहार के बाद भगवान शिव पांडवों से रूष्ट हो गए थे। तब भगवान शिव की प्रसन्न करने के लिए पांडवों ने इस मंदिर का निर्माण कर उनकी उपासना की थी।

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मदमहेश्वर के लिए कहा जाता है कि यहां शिवजी ने मधुचंद्ररात्रि मनायी थी। प्रकृति से बड़ा कोई तीर्थ क्या होगा? इस तीर्थ के विषय में यह कहा गया है कि जो व्यक्ति भक्ति से या बिना भक्ति के ही मदमहेश्वर के माहात्म्य को पढ़ता या सुनता है उसे शिवलोक की प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति इस क्षेत्र में पिंडदान करता है, वह पिता की सौ पीढ़ी हले के और सौ पीढ़ी बाद के तथा सौ पीढ़ी माता के तथा सौ पीढ़ी श्वसुर के वंशजों को तरा देता है- "शतवंश्या: परा: शतवंश्या महेश्वरि:। मातृवंश्या: शतंचैव तथा श्वसुरवंशका:।। तरिता: पितरस्तेन घोरात्संसारसागरात्। यैरत्र पिंडदानाद्या: क्रिया देवि कृता: प्रिये।।" यहां आकर आपको लगेगा कि सच में आप भगवान भोलेनाथ के घर में हैं। बेहतरीन नजारों और खूबसूरत वादियों में बसे यहां भोलेनाथ अपने भक्तों की हर मनोकामना पूरी करते हैं।


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