उत्तराखंड में भूकंप...उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग समेत कई इलाकों में सहमे लोग

प्राकृतिक आपदा के लिहाज से बेहद संवेदनशील माने जाने वाले उत्तराखंड में बीती रात भूकंप के झटके महसूस किए गए हैं। पढ़िए पूरी खबर..

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प्राकृतिक आपदा के लिहाज से उत्तराखंड बेहद ही संवेदशील राज्य है। ये बात भी सच है कि उत्तराखंड ने भयानक भूकंप जैसे भी कई ज़ख्म झेले हैं। वैज्ञानिक भी मानते हैं कि उत्तराखंड में कई जगह भू-गर्भीय स्थिति से कभी भी कोई बड़ी घटना घट सकती है। अब एक बार फिर से उत्तराखंड को ऐसी ही स्थिति से दो-चार होना पड़ा है। उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में बीती रात भूकंप के झटके महसूस किए गए। रात को करीब 9 बजकर 25 मिनट पर आए इस भूकंप की वजह से लोग घरों से बाहर निकल आए। रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी और हिमाचल से सटे उत्तराखंड के इलाकों में ये झटके महसूस किए गए हैं। भूकंप की तीव्रता 3 से 4 रिक्टर स्केल के करीब बताई जा रही है। आपदा प्रबंधन विभाग और उत्तरकाशी के जिलाधिकारी इस बाबत जानकारी जुटा रहे हैं और यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि वास्तव में ये भूकंप कितनी तीव्रता का था। वैसे आपको बता दें कि भूकंप से लिहाज से उत्तराखंड को कई बार वैज्ञानिक चेतावनियां भी मिल चुकी हैं...आगे पढ़िए।


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पिछले 7 साल में उत्तरकाशी की धरती 18 बार कांप चुकी है, जिससे यहां के लोग बेहद डरे हुए हैं। हालांकि प्रकृति की तरफ से मिल रही चेतावनी को अनदेखा कर यहां बहुमंजिला इमारतों का निर्माण लगातार जारी है। ये अनदेखी आने वाले समय में बड़े हादसे का सबब बन सकती है। उत्तरकाशी जिला भूकंप के लिहाज से बेहद संवेदनशील जोन 4 और 5 में आता है। भूगर्भीय दृष्टी से ये सीमांत जिला बहुत संवेदनशील है। टैक्टोनिक प्लेट्स जिले के नीचे से होकर गुजर रही है, इनमें सामान्य हलचल होने पर भी भूकंप का खतरा बना रहता है। 20 अक्टूबर 1991 में उत्तरकाशी पहले भी भूकंप की तबाही से जूझ चुका है। उस वक्त यहां पर 6.8 तीव्रता वाला भूंकप आया था, जिसमें भारी तबाही हुई थी। भूकंप के दौरान 6 सौ से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी, जबकि सैकड़ों मकान जमीन में समा गए थे।

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इससे पहले देहरादून के लिए भूकंप की चेतावनी भी दी जा चुकी है। जीपीएस के माध्यम से पता चला है कि ये पूरा भूभाग हर साल 18 मिलीमीटर की दर से सिकुड़ता जा रहा है। इस सिकुड़न की वजह से धरती के भीतर ऊर्जा का का जबरदस्त भंडार बन रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ये ऊर्जा ही चिंता का सबसे बड़ा सबब है, जो कभी भी सात या फिर आठ रिक्टर स्केल के भूकंप के रूप में बाहर निकल सकती है। रिसर्च में बताया गया है कि इस पूरे क्षेत्र में बीते 500 से ज्यादा सालों से कोई शक्तिशाली भूकंप नहीं आया है। एक वक्त ऐसा भी आएगा, जब धरती की सिकुड़न आखिरी स्तर पर होगी। उस वक्त कहीं भी भूकंप के रूप में ये ऊर्जा बाहर निकलेगी। वैज्ञानिकों का कहना है कि नेपाल में भी कुछ ऐसा ही हुआ था। वहां धरती हर साल 21 मिलीमीटर की दर से सिकुड़ रही थी और इस वजह से साल 2015 में 7.8 रिक्टर स्केल का बड़ा भूकंप आया था।


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