सलाम: जब गरीब बाप-बेटी ने रोका बड़ा रेल हादसा...बचाई 2 हजार लोगों की जान

गरीब पिता-बेटी ने समाज और इंसानियत के लिए जो किया है वो वाकई काबिले तारीफ है। जानिए इन दोनों ने कैसे अपनी सूझबूझ से हजारों लोगों की जान बचाई।

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कहते हैं कि हर इंसान की जिंदगी में एक ना एक बार वो पल जरूर आता है...जब उसे कुछ ऐसा कर दिखाने का मौका मिलता है, जो लोगों के लिए मिसाल बन जाए। ऐसे ही लोगों को हम हीरो कहते हैं....उन्हें अपना रोल मॉडल मानते हैं। एक गरीब पिता और उसकी नन्हीं सी बेटी के जीवन में जब ऐसा ही एक मौका आया तो उन्होंने अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई और कुछ ऐसा कर दिखाया कि आज उनकी हर जगह तारीफ हो रही है। गरीब पिता और बच्ची की समझदारी ने एक बड़े रेल हादसे को ना सिर्फ टाल दिया, बल्कि उनकी हिम्मत की वजह से ट्रेन में सवार दो हजार लोगों की जान भी बची। घटना एक साल पुरानी जरूर है लेकिन आज भी भारतीय रेलवे उस पल को याद कर इस बाप-बेटी को सलाम करता है। ये घटना पिछले साल 15 जून की है, जब त्रिपुरा के अगरतला में पिता-बेटी की जोड़ी ने अपनी सूझबूझ से हजारों लोगों की जान बचाई। आगे जानिए...

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घटना के वक्त धंचारा गांव के रहने वाले स्वपन देबबर्मा और उनकी बेटी सोमती ढलाई जिले के अथारामुरा पहाड़ी पर चढ़ रहे थे। इसी दौरान उन्होंने देखा की सामने से एक ट्रेन आ रही है, लेकिन ट्रेन जिस दिशा में बढ़ रही थी, वहां आगे कोई रेलवे ट्रैक नहीं था। ये ट्रेन अगरतला से धर्मनगर की तरफ आ रही थी, लेकिन बारिश और भूस्खलन की वजह से ट्रैक अपनी जगह से हट गए थे। पिता और बेटी ने खतरा भांप लिया और उन्होंने उसी वक्त ये फैसला ले लिया कि चाहे जो हो जाए तेजी से आ रही ट्रेन को किसी तरह रुकवाना होगा। समझदारी दिखाते हुए स्वपन ने अपनी शर्ट उतार कर ड्राइवर को सिग्नल देना शुरू कर दिया, वो तेजी से ट्रेन की दिशा में दौड़ पड़े, पिता को ऐसा करते देख सोमती भी हाथ हिलाकर ट्रेन रुकवाने की कोशिश करने लगी।

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ट्रेन ड्राइवर ने संकेत को समझ ट्रेन को रोक दिया और इस तरह एक बड़ा हादसा होते-होते टल गया। ट्रेन ड्राइवर सोनू कुमार मंडल कहा कि अगर हमने सिग्नल देखकर ट्रेन नहीं रोकी होती तो यह एक बड़ी दुर्घटना हो सकती थी, जिसमें कई लोगों की जान जा सकती थी। स्वपन और सोमती एक आदिवासी परिवार से आते हैं जो कि घर चलाने के लिए जंगल से लकड़ियां और बांस काट कर बाजार में बेचते हैं। बेहद गरीबी में दिन काट रहे ये पिता-बेटी चाहते तो रेलवे ट्रैक को नजरअंदाज कर आगे बढ़ सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा ना कर के अपनी जिम्मेदारी अच्छी तरह निभाई। दोनों ने साबित कर दिया कि इंसानियत अभी जिंदा है और समाज के लिए कुछ बेहतर करने के लिए संसाधनों का नहीं...दिल में इच्छाशक्ति का होना जरूरी है। उनकी बहादुरी को सलाम करते हुए 21 जून को त्रिपुरा सरकार में मंत्री सुदीप रॉय बर्मन ने दोनों को सम्मानित किया।


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