चमोली की जिलाधिकारी की कोशिश का असर...इस DM ने भी अपनी बेटी को आंगनबाड़ी भेजा

चमोली की डीएम स्वाति भदौरिया ने दो महीने अपनी बेटी का दाखिला आंगनबाड़ी केंद्र में कराया था। उनकी मुहिम रंग ला रही है, एक और डीएम ने अपनी बेटी का एडमिशन आंगनबाड़ी में कराया है।

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कौन कहता है कि एक अकेला आदमी समाज नहीं बदल सकता, ये मुश्किल जरूर लगे....लेकिन अगर ईमानदारी से कोशिश की जाए तो समाज की सोच में धीरे-धीरे ही सही बदलाव जरूर लाया जा सकता है। बदलाव की ऐसी ही एक कोशिश उत्तराखंड में चमोली की डीएम स्वाति भदौरिया ने की थी, जब उन्होंने अपने बेटे का एडमिशन किसी महंगे प्री-स्कूल में कराने की बजाय सरकार की तरफ से संचालित आंगनबाड़ी केंद्र में कराया था। डीएम स्वाति भदौरिया की इस पहल का परिणाम ये निकला कि अब अलग-अलग राज्यों के आईएएस और आईपीएस अफसर महंगे स्कूलों को छोड़ आंगनबाड़ी में अपने बच्चों का दाखिला करा रहे हैं। चमोली की डीएम स्वाति भदौरिया के इस प्रयास से प्रभावित होकर अब तमिलनाडु के तिरुनेलवेली की डीएम शिल्पा प्रभाकर ने भी अपनी बेटी का एडमिशन किसी प्ले स्कूल में कराने की बजाय आंगनबाड़ी में करा कर दूसरे लोगों के सामने अनुकरणीय उदाहरण पेश किया है।

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इस मुहिम को शुरू करने का श्रेय चमोली की डीएम स्वाति भदौरिया को जाता है। दो महीने पहले उन्होंने अपने बेटे को किसी महंगे स्कूल में भेजने की बजाय उसका एडमिशन गोपेश्वर गांव के आंगनबाड़ी केंद्र में कराया था। उस वक्त उन्होंने कहा था कि आंगनवाड़ी केंद्रों में बच्चों के विकास के लिए जरूरी सभी प्रकार की सुविधाएं और समग्र वातावरण मौजूद है। स्वाति के पति नितिन भदौरिया भी आईएएस अफसर हैं और इस वक्त अल्मोड़ा के जिलाधिकारी के पद पर तैनात हैं। वो कहती हैं कि जब मेरे बेटे ने आंगनबाड़ी में अपने सहपाठियों के साथ खाना खाया तो वो बेहद खुश था। आंगनबाड़ी केंद्रों को लेकर लोगों की सोच बदलनी चाहिए, अभ्युदय का दाखिला आंगनबाड़ी में कराने का यही उद्देश्य है। स्वाति भदौरिया की इस पहल का असर भी दिखने लगा है।

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इस बीच तमिलनाडु के तिरुनेलवेली की डीएम शिल्पा प्रभाकर ने भी अपनी बेटी का दाखिला आंगनबाड़ी केंद्र में करा दिया है। 2009 बैच की आईएएस शिल्पा प्रभाकर का कहना है, 'आंगनवाड़ी में बच्चों की सेहत पर नजर रखी जाती है। सभी बच्चों की सेहत पर ध्यान दिया जाए, इसलिए मैंने अपनी बेटी को आंगनवाड़ी में भेजा।' आपको बता दें कि देश में इस वक्त 17 लाख आंगनबाड़ी केंद्र संचालित हो रहे हैं, जिनमें करीब 27 लाख से ज्यादा कर्मचारी काम कर रहे हैं। सरकारी स्कूलों और आंगनबाड़ी केंद्रों की हालत किसी से छिपी नहीं है, लेकिन अगर बदलाव लाना है तो ये जरूरी है कि सरकारी पदों पर काम करने वाले लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ने भेजें। ऐसे वक्त में जब कि लोगों में अपने बच्चों का दाखिला महंगे प्राइवेट स्कूलों में कराने की होड़ लगी है, चमोली की डीएम ने जो साहसिक कदम उठाया है वो वाकई शानदार पहल है और इस पहल के कामयाब परिणाम भी सामने आने लगे हैं।


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