देवभूमि के देवलगढ़ मंदिर का रहस्य जानेगी दुनिया, सर्वे के लिए पहुंची शोधकर्ताओं की टीम

देवलगढ़ के ऐतिहासिक स्थलों पर कूट लिपी में लिखे गए संदेश जल्द ही पढ़े जा सकेंगे। एएसआई ने इस दिशा में प्रयास शुरू कर दिए हैँ।

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उत्तराखंड का इतिहास खुद में कई रहस्य समेटे हुए है, यहां के प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थलों पर पहाड़ के पूर्वजों ने प्राचीन कूटलिपि में कई संदेश छोड़े हुए हैं, लेकिन क्योंकि इस लिपि को पढ़ा नहीं जा सका है, ऐसे में लोग अपने गौरवशाली इतिहास के बारे में ज्यादा नहीं जानते। एक ऐसा ही ऐतिहासिक स्थल है देवलगढ़...जहां 'सोम का मांडा' नामक स्मारक स्थित है। इस स्मारक के पत्थरों पर गढ़वाल के पूर्व नरेशों ने कूट लिपि में कुछ संदेश लिखवाए थे, लेकिन इन्हें आज तक पढ़ा नहीं जा सका। हालांकि अच्छी बात ये है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इस तरफ ध्यान देना शुरू कर दिया है। बुधवार को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) लखनऊ के उप अधीक्षक डॉ. आलोक रंजन के नेतृत्व में विभाग की टीम ने देवलगढ़ पहुंची और वहां शिलालेखों पर उकेरी गई लिपि के फोटोग्राफ लिए।

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स्पेशल स्टांपिंग पेपर पर शब्दों को ट्रेस भी किया गया। अब इस स्थल के इतिहास के बारे में ज्यादा जानकारी मिलने की उम्मीद जगी है। 'सोम का मांडा' स्मारक श्रीनगर से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित है। देवलगढ़ को प्राचीन गढ़वाल नरेशों की राजधानी कहा जाता है। यहां पर आज भी कई प्राचीन मंदिर, नाथ सिद्धों की गुमटियां और सोम का मांडा जैसे ऐतिहासिक स्थल हैं। यहां चट्टानों को काट कर बनाई गई सुरंगें भी हैं। ऐतिहासिक स्थल होने के बावजूद इस क्षेत्र का अपेक्षित विकास नहीं हो पाया है। सोम का मांडा स्मारक को गढ़वाल के पूर्व नरेशों का न्यायालय का कहा जाता है। एएसआई के अधिकारियों ने बताया कि ऐतिहासिक स्थलों के शिलालेखों पर अंकित लेखों का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाएगा। उन्होंने बताया कि प्राचीन लिपि के अक्षरों के साथ ही कीलनुमा किसी वस्तु से की गई ओवर राइटिग भी पकड़ में आ रही है।

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इससे अक्षरों की प्राचीन बनावट में कुछ अंतर दिखाई दे रहा है। कुछ जगहों पर चूना पत्थर से ओवर राइटिंग की गई है। गौरा देवी मंदिर के पुश्ते पर लगे शिलालेख में अंकित लिपि को भी पढ़ने का प्रयास किया जाएगा। कहा जाता है कि इस शिलालेख में राजा अजयपाल का उल्लेख है। देवलगढ़ में स्थित नाथ सिद्धों की समाधियों पर अंकित कूट लिपियों का भी एएसआइ के वैज्ञानिक अध्ययन करेंगे। देवलगढ़ क्षेत्र सामाजिक एवं सांस्कृतिक विकास समिति के अध्यक्ष कुंजिका प्रसाद उनियाल की पहल पर प्राचीन स्मारकों के शिलालेखों की लिपि पढ़ने का प्रयास शुरू हो गया है। पिछले साल प्रदेश के तत्कालीन संस्कृति सचिव दिलीप जावलकर ने भी देवलगढ़ पहुंचकर इन प्राचीन स्मारकों को देखा था। धन्य है देवभूमि...जहां आज भी कई देवस्थान अपने आप में रहस्य समेटे हुए हैं।


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