देवभूमि का वो शिव मंदिर...जो दुनिया के लिए अजूबा है..लेकिन यहां पूजा करना मना है!

पिथौरागढ़ में एक हथिया देवाल मंदिर को आज भी श्रापित माना जाता है। सैकड़ों साल पुराने इस मंदिर में आज भी पूजा करना वर्जित है।

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उत्तराखंड के कण-कण में देवताओं का वास है, इसे भगवान शिव का क्षेत्र माना जाता है। कई धामों और शक्तिपीठों वाली इस धरती पर शिव के कई धाम हैं, लेकिन इनमें एक धाम ऐसा भी है जिसे आज भी शापित माना जाता है। कहा जाता है कि इस मंदिर को एक आदमी ने एक दिन में और एक ही औजार से बनाया था, लेकिन आखिर ऐसा क्या हुआ जो इस मंदिर में आज तक पूजा नहीं हुई। कहते हैं यहां पूजा करने पर विनाश होता है, लोग इस मंदिर के पास आते तो हैं, लेकिन क्योंकि यहां पूजा करना वर्जित है, इसीलिए मंदिर को दूर से देख वापस लौट जाते हैं। ये मंदिर है एक हथिया देवाल मंदिर जो कि पिथौरागढ़ से करीब 70 किलोमीटर दूर ग्राम सभा बल्तिर में स्थित है। इस मंदिर को लेकर क्षेत्र में कई कहानियां प्रचलित हैं। ये कहानियां कितनी सच्ची हैं, ये तो नहीं पता, लेकिन इस मंदिर में पूजा आज भी नहीं होती। इसे श्रापित माना जाता है। आगे जानिए पूरी कहानी

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इस मंदिैर को देखकर आप कभी यकीन ही नहीं कर पाएंगे किं यह एक ही पत्थ।र से बना है। यह मंदिर शिव भगवान को समर्पित है लेकिन इस मंदिर में पूजा-पाठ करना वर्जित है। बताया जाता है कि मंदिर 12वीं शताब्दी में बना था। मंदिर के निर्माण में नागर और लैटिन शैली की स्थापत्य कला का अद्भुत संयोजन देखने को मिलता है। लोग कहते हैं कि सैकड़ों साल पहले इस गांव में एक मूर्तिकार रहा करता था। एक बार किसी दुर्घटना में उसने अपना एक हाथ गंवा दिया। इससे वो बहुत निराश हुआ, लेकिन फिर उसने मंदिर निर्माण का फैसला लिया। लोगों के तानों की परवाह ना कर उसने गांव के दक्षिण में एक चट्टान को काट कर रातों-रात एक मंदिर खड़ा कर दिया, लेकिन मंदिर बनाते वक्त उसने ध्यान नहीं दिया कि ये जगह लोगों के शौच आदि के लिए थी। सुबह पंडितों ने मंदिर के अंदर उकेरी भगवान शिव की मूर्ति और लिंग को देखा तो उसमें भी उन्हें खामियां दिखाई दीं। दरअसल मूर्तिकार ने जल्दबाजी में मंदिर के अंदर स्थापित शिवलिंग का अरघा विपरीत दिशा में बना दिया था, जिसकी पूजा फलदायक नहीं होती। बस तब से ये मंदिर श्रापित है, इसे लेकर और भी कई कहानियां और मान्यताएं प्रचलित हैं। मंदिर में कभी पूजा नहीं होती, लेकिन हां लेकिन इसे देखने के लिए लोग दूर-दूर से यहां आते हैं।


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