पहाड़ में गर्भवती महिला की दर्दनाक मौत, वक्त पर इलाज मिलता तो वो आज जिंदा होती

स्वास्थ्य सेवाओं का उत्तराखंड में क्या हाल है ? या यूं कहिए कि उत्तराखंड के अस्पताल ही बीमार हैं ? अस्पताल में ही जच्चा-बच्चा की मौत हो गई।

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अगर वक्त पर इलाज मिलता, तो वो मां आज जिंदा रहती लेकिन दुर्भाग्य है कि ना तो मां जीवित है और ना ही वो नवजात। ये दर्दनाक कहानी पहाड़ के अलावा और कहां की हो सकती है ? रुद्रप्रयाग जिले के रूतूड़ा गांव के रहने वाले मनोज अपनी पत्नी सपना को लेकर जिला अस्पताल आए थे। दरअसल सपना प्रसव पीड़ा से तड़प रही थीं। ऐसी हालत में पति अपनी पत्नी को लेकर अस्पताल तो ले आए लेकिन आरोप है कि अस्पताल में इलाज शुरू नहीं हुआ। वक्त बीतता गया और सपना का दर्द बेइंतहा बढ़ने लगा। जब दर्द हद से पार हुआ तो डॉक्टरों ने सपना को श्रीनगर बेस हॉस्पिटल के लिए रेफर करवा दिया। सवाल ये भी तो है कि अगर श्रीनगर ही रेफर करवाना था, तो इतनी देर क्यों की गई ? क्या किसी की जान की कोई कीमत ही नहीं है? इसके बाद महिला को श्रीनगर ले जाया गया। वहां ऑपरेशन कक्ष में डॉक्टरों ने महिला के पेट से मृत बच्चे को बाहर निकाला। ये ही नहीं महिला की भी मौत हो गई।

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डॉक्टरों का कहना है कि महिला की बच्चेदानी फट गई थी और इस वजह से उनकी मौत हो गई। पति ने डॉक्टर्स पर आरोप लगाया है कि उनकी गलती की वजह से ही महिला की मौत हुई है। महिला के पति मनोज कुमार का कहना है कि ये उनकी पत्नी का दूसरा प्रसव था। उसकी बड़ी बेटी 4 साल की है। बेस अस्पताल के सीएमएस डॉ केपी सिंह का कहना है कि महिला का काफी देरी से अस्पताल लाया गया और वक्त पर इलाज ना मिलने की वजह से जच्चा बच्चा की मौत हुई है। उनका कहना है कि डॉक्टरों की टीम की ओर से जच्चा बच्चा को बचाने की हर कोशिश की गई लेकिन वो बच नहीं पाए। आपको याद होगा पिछले साल जुलाई माह में भी एक गर्भवती महिला और उसके नवजात बच्चे की भी ज़िला चिकित्सालय में मौत हो गई थी। इस मामले में हुई मजिस्ट्रीयल जाँच में चिकित्सकों पर लापरवाही का आरोप सही साबित हुआ था। इसके बाद शासन स्तर पर हुई जाँच का आज तक ख़ुलासा नहीं हुआ। इस पूरे मामले में जन अधिकार मंच द्वारा एक लंबी लड़ाई लड़ी थी। आज भी यह लड़ाई जारी है। श्रीनगर बेस अस्पताल में जच्चा-बच्चा की मौत के मामले में भी जन अधिकार मंच ज़िलाधिकारी से उच्च स्तरीय निष्पक्ष जाँच की मांग कर रहा है।


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