ये हैं देवभूमि के 13 धाम जहां जागृत रूप में विराजमान रहती हैं मां दुर्गा

देवी-देवताओं की इस धरती में हजारों मंदिर अपनी अलग ही कहानी समेटे हुए हैं। इन्ही मंदिरों में से उत्तराखंड के इन 13 धामों में मां दुर्गा जागृत रूप में निवास करती है..

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देवभूमि उत्तराखंड में कदम कदम पर मौजूद देवस्थान ये साबित करने के लिए काफी हैं कि आस्था से इस धरती के लोगों का सदियों पुराना नाता है। देवी-देवताओं की इस धरती में हजारों मंदिर अपनी अलग ही कहानी समेटे हुए हैं। इन्ही मंदिरों में से उत्तराखंड के इन 13 धामों में मां दुर्गा जागृत रूप में निवास करती है.. कालिशिला, कालीमठ, हाट कालिंका, कसार देवी, धारी देवी, मठियाणा देवी, चंद्रबदनी, सुरकंडा देवी, माँ वाराही, देवीधुरा मंदिर, भद्रकाली, पाषाण देवी, ज्वालपा और राज राजेश्वरी में निवास करने वाली मां दुर्गा के जागृत रूपों के बारे में जानिये..

1/13 कालीशिला...देवभूमि का सिद्धपीठ, जहां देवी ने 12 साल की कन्या के रूप में जन्म लिया
kalishila temple uttarakhand godess durga

उत्तराखंड का ये वो शक्तिपीठ है, जिसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती। एक बात अच्छी तरह से जान लीजिए कि अगर आपने यहां आकर तीन दिन और तीन रात तन, मन, धन से जागरण किया और मां की साधना की तो समझ जाइऐ कि जीन के बाकी दुखों के निवारण के लिए आपको कहीं नहीं जाना पड़ेगा। हर दुख यहां समूल नष्ट हो जाएगा। मां भगवती का असीमित 'शक्तिपुंज' देवभूमि उत्तराखंड में ऊंचाई पर मौजूद है। कालीमठ मंदिर रुद्रप्रयाग में स्थित है। यहां से करीब आठ किमी. खड़ी चढ़ाई के बाद कालीशिला के दर्शन होते हैं। विश्वास है कि मां दुर्गा शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज का संहार करने के लिए कालीशिला में 12 वर्ष की कन्या के रूप में प्रकट हुई थीं। कालीशिला में देवी-देवताओं के 64 यंत्र हैं। मान्यता है कि इस स्थान पर शुंभ-निशुंभ दैत्यों से परेशान देवी-देवताओं ने मां भगवती की तपस्या की थी। तब मां प्रकट हुई।

2/13 देवभूमि का वो शक्तिपीठ...जहां शिला पर मौजूद हैं महाकाली के पैरों के निशान
kalimath temple uttarakhand godess durga

कालीमठ मंदिर भारत के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक है। तंत्र और साधना करने वालों के लिए इस मंदिर का महत्व कामख्या और मां ज्वालामुखी के मंदिरों समान है। कालीमठ मां दुर्गा के काली स्वरूप को समर्पित है। यहां मौजूद मंदिर में श्रद्धालु किसी प्रतिमा की नहीं, बल्कि एक पवित्र कुंड की पूजा करते हैं। ये कुंड सालभर रजतपट श्रीयंत्र से ढंका रहता है। कहा जाता है कि इस कुंड में साक्षात मां काली का वास है। स्कंदपुराण में भी इस मंदिर का जिक्र मिलता है। कालीमठ में महाकाली, श्री महालक्ष्मी और श्री महासरस्वती के तीन भव्य मंदिर है। कहा जाता है कि कालीमठ में ही कवि कालिदास ने मां काली की आराधना कर ज्ञान का वरदान हासिल किया था। नवरात्र में यहां मां के दर्शनों के लिए श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। श्रद्धा से मांगी गई मनोकामना मां काली जरूर पूरी करती हैं।

3/13 देवभूमि की जागृत काली...कुमाऊं रेजीमेंट की आराध्य देवी, कई युद्धों में की जवानों की रक्षा!
Hat Kalinka Pithauragarh Uttarakhand

पिथौरागढ़ जिले का गंगोलीहाट में स्थापित हाट कालिका एक शक्तिपीठ है। जो उत्तराखंड के लोगों के ही नहीं बल्कि मां शक्ति में विश्वास रखने वाले भक्तों के बीच भी काफी प्रसिद्ध है। पहाड़ों के बीच बने इस मंदिर में सालभर मां के दर्शनों के लिए लोगों का तांता लगा रहता है। कहा जाता है कि द्वितीय विश्वयुद्ध (1939-1945) के दौरान भारतीय सेना का जहाज डूबने लगा। तब सेना के अधिकारियों ने जवानों से अपने-अपने भगवान को याद करने का कहा। लेकिन सब के सामने चमत्कार तब हुआ जब कुमाऊं के सैनिकों ने हाट काली का जयकारा लगाया और वैसे ही जहाज किनारे आ गया। इस घटना के बाद से कुमाऊं रेजीमेंट ने मां काली को आराध्य देवी की मान्यता दे दी।

4/13 देवभूमि के इस मंदिर को नासा का प्रणाम, रिसर्च में निकली हैरान करने वाली बातें
kasar devi temple almora uttarakhand

ये स्थान भारत का एकमात्र और दुनिया की तीसरी ऐसी जगह है, जहां खास चुम्बकीय शक्तियां मौजूद हैं। खुद नासा के वैज्ञानिक भी इस पर शोध कर चुके हैं। उत्तराखंड के अल्मोड़ा में कसार पर्वत पर मौजूद है मां दुर्गा का मंदिर।इस मंदिर में अनोखी शक्तियां मौजूद हैं। अब तक हुए इस अध्ययन में पाया गया है कि अल्मोड़ा स्थित कसारदेवी मंदिर और दक्षिण अमेरिका के पेरू स्थित माचू-पिच्चू व इंग्लैंड के स्टोन हेंग में अद्भुत समानताएं हैं। इन तीनों जगहों पर चुंबकीय शक्ति का विशेष पुंज है। स्वामी विवेकानंद ने 1890 में ध्यान के लिए कुछ महीनों के लिए आए थे।इस मंदिर ने विज्ञान जगत को भी हिलाकर रख दिया है। यहां आने वाले भक्त आसानी से सैकड़ों सीढ़ियां बिना किसी थकावट के ही चढ़ जाते हैं।

5/13 मां धारी देवी...उत्तराखंड के चार धामों की रक्षक...हर दिन तीन रूपों में दिखती हैं मां !
dhari devi temple shrinagar uttarakhand

उत्तराखंड में श्रीनगर से करीब 14 किमी दूरी पर प्राचीन सिद्धपीठ धारी देवी मंदिर स्थित है। यहां प्राचीन मंदिर बांध की झील में डूब गया है, लेकिन इसके बाद भी भक्तों की आस्था नहीं डिगी। यहां से मां काली स्वरूप धारी देवी की प्रतिमा को उसी स्थान पर अपलिफ्ट कर अस्थायी मंदिर में स्थापित किया गया है। जनश्रुति है कि यहां मां काली प्रतिदिन तीन रूप प्रात: काल कन्या, दोपहर युवती और शाम को वृद्धा का रूप धारण करती हैं। प्राचीन देवी की मूर्ति के इर्द-गिर्द चट्टान पर एक छोटा मंदिर स्थित था। मां धारी देवी का मंदिर अलकनंदा नदी पर बनी 330 मेगावाट श्रीनगर जल विद्युत परियोजना की झील से डूब क्षेत्र में आ गया। यहां से मां काली का रूप माने जाने वाली धारा देवी की प्रतिमा को 16 जून 2013 की शाम को हटाया गया। उस दौरान कुछ लोगों का कहना था कि प्रतिमा हटाने के कुछ घंटे के बाद ही उत्तराखंड में आपदा आई थी।

6/13 उत्तराखंड का वो मंदिर, जहां निवास करती हैं धरती की सबसे जागृत महाकाली !
maa mathiyana temple rudraprayag uttarakhand

मठियाणा माता का मन्दिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के सिलीगों गांव में स्थित है , यहाँ आने के लिए रुद्रप्रयाग से तिलवाड़ा, घेघड़ होते पंहुचा जा सकता है। सड़क मार्ग से मंदिर कि दूरी लगभग 2 किलोमीटर पैदल तय करनी पड़ती है। एक दूसरा रास्ता श्रीनगर से कीर्तिनगर ,बडियार गढ़ सौरखाल होते हुए डोंडा, चौरिया तक जाता है । इसके बाद भरदार सिलिगों से थोडा पैदल चलकर आप यहां पहुंच सकते है। माँ मठियाणा भरदारी राजवंशों कि कुल देवी है। प्राचीन लोक कथाओं के अनुसार माँ मठियाणा सिरवाड़ी गढ़ के राजवंशों की धियान थी। जिसका विवाह भोट यानि तिब्बत के राजकुमार से हुआ था। कुछ पौराणिक कथाएं अलग भी हैं। कहा जाता है कि माता के अग्नि में सती होने पर भगवान शिव जब उनके शरीर को लेकर भटक रहे थे तब माता सती का शरीर का एक भाग यहाँ गिरा, बाद में इस भाग माता मठियाणा देवी कहा गया। दर्शन के लिए आप आप रुद्रप्रयाग से तिलबाड़ा होते हुए यहाँ आसानी से सड़क के मार्ग से पहुंच सकते हैं। ग्राम पंचायत जखोली में ब्राह्मणों के द्वारा राज राजेश्वरी मां मठियाणा मूर्ति की स्थापना और प्राण प्रतिष्ठा कराई जाती है।

7/13 देवभूमि का वो सिद्पीठ... जहां रात को परियां करती हैं नृत्य, गंधर्व लगाते हैं गीत
chandrabadni temple uttarakhand

मां चन्द्रबदनी का मंदिर। कहा जाता है कि जगत गुरु शंकराचार्य ने श्रीयंत्र से प्रभावित होकर चन्द्रकूट पर्वत पर चन्द्रबदनी शक्ति पीठ की स्थापना की थी। इस देवस्थल की एक खास बात है। कहा जाता है कि इस मंदिर में देवी चन्द्रबदनी की मूर्ति नहीं है। यहां सिर्फ देवी का श्रीयंत्र पूजा जाता है। कहा जाता है कि इस मंदिर गर्भ गृह में एक शिला पर ही श्रीयंत्र बना है। उसके ऊपर चाँदी का बड़ा छत्र रखा गया है। इस मंदिर पुरातात्विक अवशेष से पता चलता है कि सदियों पहले ही इस मंदिर का निर्माण किया गया था। कहा जाता है कि देवी मां के डर से यहां के राजा ने भी कभी मंदिर के कामों में बाधा नहीं डाली। चन्द्रबदनी माँ सती का ही रूप कही जाती हैं। कहा जाता है कि मां पार्वती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में दुखी होकर हवन कुण्ड में आत्मदाह किया था। इसके बाद भगवान शंकर दुखी होकर मां सती के शव को अपने कंधे पर रखकर कई स्थानों में घूमने लगे। इसके बाद चन्द्रकूट पर्वत पर आकर शिव अपने यथार्थ रूप में आ गये। मान्यता है कि चंद्रकूट पर्वत पर सती का शरीर गिरा, इसलिए यहां का नाम चंद्रबदनी पड़ा। कहते हैं कि आज भी चंद्रकूट पर्वत पर रात में गंधर्व, अप्सराएं मां के दरबार में नृत्य करती हैं।

8/13 देवभूमि के इस मंदिर से आप कभी खाली हाथ नहीं जा सकते, मां कुछ जरूर देंगी !
surkanda temple tehri garhwal uttarakhand

प्रसिद्ध सिद्धपीठ मां सुरकंडा का मंदिर टिहरी जनपद में जौनुपर पट्टी के सुरकुट पर्वत पर स्थित हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार यहां सती का सिर गिरा था। तभी से ये स्थान सुरकंडा देवी सिद्धपीठ के रूप में प्रसिद्ध हुआ। इसका उल्लेख केदारखंड व स्कंद पुराण में मिलता है। कहा जाता है कि देवताओं को हराकर राक्षसों ने स्वर्ग पर कब्जा कर लिया था। ऐसे में देवताओं ने माता सुरकंडा देवी के मंदिर में जाकर प्रार्थना की कि उन्हें उनका राज्य मिल जाए। राजा इंद्र ने यहां मां की आराधना की थी। उनकी मनोकामना पूरी हुई और देवताओं ने राक्षसों को युद्घ में हराकर स्वर्ग पर अपना आधिपत्य स्‍थापित किया। इसलिए इस जगह को मनोकामना सिद्धि का मंदिर कहा जाता है। सुरकंडा मंदिर में गंगा दशहरा के मौके पर देवी के दर्शनों का विशेष महात्म्य है। माना जाता है कि इस समय जो देवी के दर्शन करेगा, उसकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होंगी। यह जगह बहुत रमणीक है। खास बात ये है कि मां अपने दरबार से किसी को खाली हाथ नहीं जाने देती।

9/13 देवभूमि का देवीधुरा मंदिर, यहां आज भी होता है बग्वाल युद्ध..रक्त से लाल होती है धरती
devidhura varahi temple champawat uttarakhand

शक्तिपीठ माँ वाराही का मंदिर जिसे देवीधुरा के नाम से भी जाना जाता हैं। देवीधुरा में बसने वाली “माँ वाराही का मंदिर” 52 पीठों में से एक माना जाता है। आषाढ़ी सावन शुक्ल पक्ष में यहां गहड़वाल, चम्याल, वालिक और लमगड़िया खामों के बीच बग्वाल (पत्थरमार युद्ध) होता है। देवीधूरा में वाराही देवी मंदिर शक्ति के उपासकों और श्रद्धालुओं के लिये पावन और पवित्र स्थान है। ये क्षेत्र देवी का “उग्र पीठ” माना जाता है। चन्द राजाओं के शासन काल में इस सिद्ध पीठ में चम्पा देवी और ललत जिह्वा महाकाली की स्थापना की गई थी। तब “लाल जीभ वाली महाकाली" को महर और फर्त्यालो द्वारा बारी-बारी से हर साल नियमित रुप से नरबलि दी जाती थी। माना जाता है कि रुहेलों के आक्रमण के समय कत्यूरी राजाओं द्वारा इस मूर्ति को घने जंगल के बीच एक भवन में स्थापित कर दिया गया था।

10/13 देवभूमि का हजारों साल पुराना मंदिर, जिसकी ताकत के आगे अंग्रेजों ने भी सिर झुकाया
bhadrkali temple bageshwar uttarakhand

माता भद्रकाली का ये धाम बागेश्वर जिले में महाकाली के स्थान कांडा से करीब 15 किलोमीटर दूर भद्रपुर नाम के गांव में स्थित है। कहा जाता है, इस मंदिर की पूजा खासतौर पर नाग कन्यायें करती है। शाण्डिल्य ऋषि के प्रसंग में श्री मूल नारायण की कन्या ने अपनी सखियों के साथ मिलकर इस स्थान की खोज की। भद्रपुर में ही कालिय नाग के पुत्र भद्रनाग का वास कहा जाता है। भद्रकाली इनकी ईष्ट है। माता भद्रकाली का प्राचीन मंदिर करीब 200 मीटर की चौड़ाई के एक बड़े भूखंड पर अकल्पनीय सी स्थिति में स्थित है। इस भूखंड के नीचे भद्रेश्वर नाम की सुरम्य पर्वतीय नदी 200 मीटर गुफा के भीतर बहती है। गुफा में बहती नदी के बीच विशाल ‘शक्ति कुंड’ कहा जाने वाला जल कुंड भी है, जबकि नदी के ऊपर पहले एक छोटी सी अन्य गुफा में भगवान शिव लिंग स्वरूप में तथा उनके ठीक ऊपर भू-सतह में माता भद्रकाली माता सरस्वती, लक्ष्मी और महाकाली की तीन स्वयंभू प्राकृतिक पिंडियों के स्वरूप में विराजती हैं।

11/13 उत्तराखंड का पाषाण देवी मंदिर, यहां के पवित्र जल से दूर होते हैं त्वचा संबंधी रोग
pashaan devi temple nainital uttarakhand

पाषाण देवी मंदिर नैनीताल के लोगों के साथ साथ पूरे देश से आने वाले भक्तों के लिए खासा महत्व रखता है। नवरात्रि के पावन पर्व में यहां भक्तों का तांता लगा रहता है। खास तौर पर नवरात्रि के नवें दिन इस मंदिर का महत्व और भी बढ़ जाता है, क्यो कि इस मंदिर में मां भगवती के सभी 9 स्वरूपों के दर्शन एक साथ होते हैं। मां के नौ रूपों के दर्शन के लिए भक्त दूर-दूर से आते हैं। नैनी झील के किनारे चट्टान पर मां भगवती की कुदरती आकृति बनी हुई है। वहीं नौ पिंडी को मां भगवती के नौ स्वरूप माना जाता है। मंदिर में माता को सिंदूर का चोला पहनाया जाता है। साथ ही मान्यता है कि माता की पादुकाएं नैनीताल की झील के अंदर हैं। इसलिए झील के जल को कैलास मानसरोवर की तरह पवित्र माना जाता है। श्रद्धालु इस नैनी सरोवर के जल को अपने घर लेकर जाते हैं। कहा जाता है कि ये इतना पवित्र जल है कि इससे त्वचा से संबंधित तमाम रोग दूर हो जाते हैं। लोक मान्यता है कि जल को घर में रखने से घर में सुख शांति बनी रहती है।

12/13 उत्तराखंड की मां ज्वालपा देवी, जहां अखंड ज्योति के दर्शन से ही हर मनोकामना पूरी होती है
jwalpa devi temple uttarakhand

पौड़ी-कोटद्वार मार्ग पर नयार नदी के किनारे स्थित है मां ज्वाल्पा देवी का सिद्ध पीठ। इस सिद्ध पीठ का पौराणिक महत्व विशाल है। इस पवित्र धाम के बारे में एक बात कही जाती है कि है कि यहां सच्चे मन से मां भगवती की आराधना करने पर मन की हर इच्छा पूरी होती है। ज्वालपा देवी मंदिर पौड़ी से 34 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। नवालिका नदी यानी नयार नदी के बाएं किनारे पर स्थित ये मंदिर 350 मीटर के क्षेत्र में फैला है। नवरात्रि के दौरान इस मंदिर का भव्य नज़ारा देखने के लिए देश और दुनियाभर से लोग आते हैं। इस मंदिर की कहानी पुलोम नाम के राक्षस से जुड़ी है। कहा जाता है कि एक बार पुलोम नाम के राक्षस की कन्या सुची ने इंद्र को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए नयार नदी के किनारे तप किया था। सुची की तपस्या से खुश होकर इसी स्थान पर मां भगवती ज्वाला यानी अग्नि के रूप में प्रकट हुईं। इसके बाद मां ने राक्षस की कन्या सुची को उसकी मनोकामना पूर्ण का वरदान दिया। ज्वाला रूप में दर्शन देने की वजह से इस स्थान का नाम ज्वालपा देवी पड़ा था। देवी पार्वती के दीप्तिमान ज्वाला के रूप में प्रकट हुई थी तो वो अखंड दीपक तबसे निरंतर मंदिर में प्रज्ज्वलित रहता है।

13/13 देवभूमि की देवी राज राजेश्वरी..अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और UAE तक जाती है इस मंदिर की भभूत
raj rajeswari temple uttarakhand

श्रीनगर गढ़वाल से 18 किमी दूर स्थित श्री राजराजेश्वरी सिद्धपीठ में सालभर लोग मां के दर्शनों के लिए पहुंचते है। धन, वैभव, योग और मोक्ष की देवी कही जाने वाली श्री राज राजेश्वरी का सिद्धपीठ घने जंगलों और गांवों के बीच देवलगढ़ में है। प्राचीन काल से आध्यात्म के लिए जानी जाने वाली राजराजेश्वरी को कई राजा महाराज भी अपनी कुल देवी मानते थे। वही आज के दौर में भी मां के भक्तों में कोई कमी नहीं आई है। सिद्धपीठ के दर्शन के लिए देश-विदेश के दर्शनार्थी देवलगढ़ पहुंचकर मन्नतें मांगते है। कहा जाता है कि गढ़वाल नरेश रहे अजयपाल ने चांदपुर गढ़ी से राजधानी बदलकर देवलगढ़ को राजधानी बनाया था। जिसके बाद अजयपाल देवलगढ़ में ही पठाल वाले भवन के रूप में मंदिर बनवाया। अद्भुत काश्तकारी का ये नमूना आज भी हर किसी को हैरान करता है। यहीं भगवती राजराजेश्वरी देवी की पूजा होती है।


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