देवभूमि का सपूत: 7 मार्च को शादी थी, होली की भी तैयारी थी...वो शहीद होकर चला गया

देहरादून के जांबाज मेजर शहीद चित्रेश की 7 मार्च को शादी थी। वो देश के लिए कुर्बान होकर चला गया। शादी के 13 दिन बाद होली भी थी...

story of major chitresh bisht martyer dehradun - उत्तराखंड, उत्तराखंड न्यूज, लेटेस्ट उत्तराखंड न्यूज, शहीद चित्रेश बिष्ट, देहरादून, देहरादून न्यूज,Uttarakhand, Uttarakhand News, Latest Uttarakhand News, Shahid Chitresh Bisht, Dehradun, Dehradun News, uttarakhand, uttarakhand news, latest news from uttarakhand

होली का त्योहार है...सभी रंगों में सराबोर होकर जश्न मनाने में जुटे हैं। लेकिन जरा सोचिए...उस परिवार के लिए होली का ये त्योहार कैसा होगा, जिस परिवार के बेटे की सात मार्च को शादी होने थी। शादी के बाद उस वीर सपूत की ये पहली होली होती, जिसे कि हमेशा जिंदगी के यादगार पलों में शुमार किया जाता है। वो था उत्तराखंड के वीर सपूत...शहीद मेजर चित्रेश बिष्ट...जिनकी शादी को लेकर मां-पिता ने कई सपने सजाए थे। चित्रेश बिष्ट के पिता ने अपना दर्द बयां किया था और कहा था कि 'अब मेरे लिए देहरादून में कुछ नहीं बचा। अब यहां नहीं रहूंगा....क्या करूंगा इस मकान का जब बेटा ही नहीं रहा...गांव चला जाऊंगा और सोनू (चित्रेश) का मंदिर बनाकर वहीं रहूंगा। बेटे की मौत के बाद यहां रखा ही क्या है। नई जिंदगी के सपने, घर में आने वाली नई बहू के सपने, एक खुशहाल परिवार के सपने...लेकिन ये सारे सपने एक झटके में टूट गए।

मेजर बन चुके बेटे चित्रेश बिष्ट की शादी 7 मार्च को होनी थी। देहरादून वाले घर में तैयारियां भी हो चुकी थी। रिश्तेदारों, मेहमानों और दोस्तों को शादी का न्योता भेजा जा चुका था। जरा उस बेटी के बारे में भी सोचिए, जिसके हाथों में चित्रेश के नाम की मेंहदी सजनी थी। सब इस तैयारी में थे कि उनका बेटा जल्द ही एलओसी से लौटेगा और 7 मार्च को शादी के साथ ही जिंदगी के नए सफर पर निकल पड़ेगा। घरवालों का इंतजार इस तरह लंबा हो गया कि बेटा कभी लौट कर वापस नहीं आ पाएगा। आया तो तिरंगे में लिपटा हुआ पार्थिव शरीर, जिसे देखकर सारे सपने कहीं खो गए। 28 फरवरी को ही उन्हें छुट्टी पर घर आना था। छुट्टी भी मंजूर हो गई थी और सारे दोस्त 28 फरवरी को अपने मेजर दोस्त के स्वागत की तैयारी कर चुके थे, लेकिन वो दोस्त 28 फरवरी से पहले ही अपने घर लौटा.. वो भी तिरंगे में लिपटा हुआ।

यह भी पढें - उत्तराखंड शहीद चित्रेश बिष्ट: मां से किया था वादा ‘नई साड़ी लाऊंगा, शादी में पहनना’
जम्मू-कश्मीर के राजौरी जिले के लाह्म सेक्टर में एक IED को defuse करते वक्त उनकी जान चली गयी। सूत्रों के मुताबिक ये विस्फोटक इस्लामिक संगठनों ने LOC के 1.5 किमी अन्दर प्लांट किया था। सेना को LOC के आसपास विस्फोटक होने की सूचना मिली थी, जिसे ढूंढ कर आई.ई.डी. को डिफ्यूज किया जाना था। IED मिलने के बाद उत्तराखंड के मेजर चित्रेश बिष्ट उसे डिफ्यूज कर रहे थे कि धमाका हो गया ये शहादत सभी का कलेजा चीर गई। मेजर चित्रेश किसी भी चुनौती से नहीं डरते थे। वो मौत से तब तक दो-दो हाथ करते रहे, जब तक कि शरीर में आखिरी सांस मौजूद थी। मेजर चित्रेश बिष्ट की अपने पापा से फोन पर आखिरी बार बात हुई, तो कहा ‘पापा मैं जल्द लौटूंगा, आप शादी की तैयारी कीजिए। मुझे आने में थोड़ी सी देरी होगी’’। कौन जानता था कि क्रूर काल एक जांबाज बेटे को मा-बाप से छीन लेगा ?


Uttarakhand News: story of major chitresh bisht martyer dehradun

Content Disclaimer (Show/Hide)
लेख शेयर करें