पुलवामा अटैक: नन्हे बच्चों को बिलखता छोड़कर चला गया उत्तराखंड का सपूत

पुलवामा में शहीद हुए वीरेंद्र सिंह दो दिन पहले ही ड्यूटी के लिए रवाना हुए थे। 20 दिन की ये छुट्टियां उनके जीवन की आखिरी छुट्टियां साबित हुईं।

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जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में हुए आतंकी हमले में शहीद जवान वीरेंद्र सिंह दो दिन पहले ही छुट्टी बिताकर जम्मू के लिए रवाना हुए थे। उनके नन्हें बच्चों को ये भान भी नहीं था कि ये उनके पिता की आखिरी छुट्टी है, इसके बाद वो अपने पिता को कभी नहीं देख पाएंगे। वीरेंद्र जिंदा होते तो अपने बच्चों को बड़ा होते देख पाते...उनकी नन्हीं अंगुली थामकर उन्हें जिंदगी का सफर तय करने का हौसला देते, लेकिन अफसोस कि ऐसा हो ना सका। पुलवामा में हुए आतंकी हमले में शहीद होने वाले 42 जवानों में से एक वीरेंद्र सिंह भी थे। उनकी पत्नी अब तक यकीन नहीं कर पा रही कि दो दिन पहले उन्होंने वीरेंद्र को ड्यूटी पर जाने के लिए जो विदाई दी थी, वो आखिरी विदाई थी। बच्चे पिता को याद कर बिलख रहे हैं। परिवार में मातम पसरा है, बच्चों को रोते देख गांव वालों की आंखें भी भर आईं।

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शहीद वीरेंद्र सिंह ऊधमसिंहनगर के खटीमा के रहने वाले थे। वो अपने परिवार के साथ मोहम्मदपुर भुढ़िया गांव में रहते थे। पुलवामा में हुए आतंकी हमले में वीरेंद्र सिंह शहीद हो गए हैं, अब केवल उनकी यादें बची हैं। वीरेंद्र अपने पीछे दो नन्हें बच्चों को छोड़ गए हैं, जिनके पालन-पोषण की जिम्मेदारी अब उनकी पत्नी पर आ गई है। गुरुवार रात नौ बजे सेना के अधिकारी ने उनकी पत्नी को फोन पर वीरेंद्र की शहादत की सूचना दी, जिसे सुन वो बेहोश हो गईं। वीरेंद्र की मौत की खबर मिलते ही घर में कोहराम मच गया। शहीद वीरेंद्र सिंह राणा के बड़े भाई जयराम सिंह बीएसएफ के रिटायर्ड सूबेदार हैं, जबकि छोटे भाई राजेश राणा घर में खेती बाड़ी का काम देखते हैं। शहीद वीरेंद्र सिंह की बड़ी बेटी 5 साल की है, जबकि बेटा अभी ढाई साल का है। परिजनों ने बताया कि वीरेंद्र दो दिन पहले ही 20 दिन की छुट्टी बिताने के बाद ड्यूटी के लिए रवाना हुए थे। वीरेंद्र सिंह सीआरपीएफ की 45वीं बटालियन में जम्मू-कश्मीर में तैनात थे।


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