देवभूमि का वो गांव, जहां घर-घर में वीरों ने जन्म लिया...पीएम मोदी भी करते हैं सलाम

देवभूमि का वो गांव, जहां घर-घर में वीरों ने जन्म लिया...पीएम मोदी भी करते हैं सलाम

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जहां तक नज़र दौड़ाइए..वहां तक आपको वीरों की टोली ही नज़र आएगी। ये उत्तराखंड है..जहां घर घर से आपको वीरों की ही गौरवगाथा सुनाई देगी। देवभूमि में...खासतौर पर पहाड़ों में चले आइए, आपको हर घर का कनेक्शन भारतीय सेना से ही जुड़ता दिखेगा। ये ही वजह है की इस धरा को वीरभूमि भी कहा जाता है। यूं तो देवभूमि का हर गांव वीरता की कहानी बयां करता नज़र आता है लेकिन आज हम आपको एक ऐसे गांव के बारे में बता रहे हैं, जैसा ना तो आपने देश में कभी देखा होगा और ना ही शायद आप भविष्य में ऐसा गांव देख पाएंगे। इस गांव के वीरों की काबीलियत की मिसाल खुद देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देते हैं। भारतीय सेना के प्रति गांव के लोगों का जज्बा देखने लायक है। सिर्फ इतना ही नहीं, इस गांव के लोगों के हौसले भी ऐसे हैं कि आप खुद ही सलाम करेंगे। रुद्रप्रयाग जिले के जखोली ब्लॉक के अंतर्गत आने वाला लुठियाग गांव के घर घर से आपको वीर सपूतों की शौर्यगाथाएं सुनने को मिलेंगी।

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लुठियाग गांव में कुल मिलाकर 257 परिवार रहते हैं। औसतन हर पांचवे परिवार से एक शख्स यहां भारतीय सेना में अपनी सेवाएं दे रहा है। इस वक्त इस गांव में 40 से ज्यादा लोग भारतीय सेना में हैं। सिर्फ इतना ही नहीं, इस गांव में 20 से ज्यादा लोग अर्धसैनिक बलों या फिर पुलिस में कार्यरत हैं। हर साल इस गांव के कई युवा भारतीय सेना की पासिंग आउट परेड का हिस्सा रहते हैं और इस वजह से खुद पीएम मोदी भी इस गांव को सलाम कर चुके हैं। इस गांव की कुछ और भी खास बातें हैं, जिनके बारे में जानकर आपके दिल में इस गांव के लिए सम्मान पैदा होगा। इस वक्त इस गांव में 40 से ज्यादा पूर्व सैनिक हैं। इनमें से कुछ ऐसे भी सैनिक हैं, जो 1962 के भारत-चीन युद्ध में शामिल हो चुके हैं। अगर आपको भारत-चीन युद्ध के किस्से सुनने है, तो इस गांव के बुजुर्गों से आप हर किस्सा और हर कहानी सुन सकते हैं।

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इस गांव के दो वीर सपूत थे देव सिंह और मुरारी सिंह। ये दोनों ही सगे भाई थे और प्रथम विश्व युद्ध के लड़ाके रह चुके हैं। ये वो दो भाई हैं, जिनके नाम दिल्ली के इंडिया गेट पर अंकित हैं। इसी गांव के दो जांबाज थे दिल सिंह और उमराव सिंह। इन दोनों ने आज़ाद हिंद फ़ौज के गठन के दौरान नेताजी सुभाष चंद्र बोस का साथ दिया था। आजादी के बाद साल 1962 की लड़ाई, साल 1971 की लड़ाई, साल 1975 और साल 1999 के कारगिल युद्ध में भी इस गांव के वीरों ने अपना शौर्य दिखाया। 14 जून 2000 का वक्त आपको याद होगा, जब लांसनायक मुरारी सिंह ने दो आंतकवादियों को अपनी बंदूक से ढेर कर दिया था। वो शहीद मुरारी सिंह भी इसी गांव के थे। आज शहीद मुरारी सिंह का बेटा भी सेना में भर्ती हो चुका है। तो बस अंदाजा लगाइए कि उत्तराखंड के ये सिर्फ एक गांव की कहानी है। बाकी गांवों के बारे में सुनाएंगे, तो ना जाने कितने किस्से और कितनी कहानियां सामने आएंगी। लुठियाग गांव के लोगों के जज्बे और देशभक्ति को पीएम मोदी भी सलाम कर चुके हैं।


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