गढ़वाल राइफल के दम पर थी आज़ाद हिंद फौज, सुभाष चंद्र बोस को इन पर भरोसा था!

गढ़वाल राइफल के दम पर थी आज़ाद हिंद फौज, सुभाष चंद्र बोस को इन पर भरोसा था!

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कुछ कहानियां ऐसी हैं, जिनसे पता चलता है कि उत्तराखंड के लोगों में देशभक्ति की भावना सदियों से उफान मार रही है। आज हम आपको इतिहास के पन्नों से ही वो सच्ची कहानी बता रहे हैं, जिसे जानकर हमारे वीर जवानों के लिए दिल में और भी ज्यादा सम्मान पैदा होता है। अगर हम आपको कहें कि आज़ाद हिंद फौज का उत्तराखंड से अटूट रिश्ता रहा है, तो आप क्या कहेंगे? आपको जानकर गर्व होगा कि आज़ाद हिंद फौज में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के सबसे भरोसेमंद सिपाही उत्तराखंडी ही थे। यहां तक कि नेताजी की सुरक्षा में जो जवान थे, वो उत्तराखंड के ही वीर थे। नेताजी जहां जाते थे, वहां उत्तराखंड के जवान ही उनकी सुरक्षा में लगे रहते थे। इतना समझ लीजिए कि उत्तराखंड के जवानों का लोहा खुद सुभाष चंद्र बोस मानते थे। आइए इस बारे में कुछ बड़ी बातें आपको बता देते हैं।

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कहा जाता है कि जिस वक्त नेताजी सुभाष चंद्र बोस आज़ाद हिंद फौज को तैयार कर रहे थे, उसी वक्त गढ़वाल राइफल की दो बटालियन इसमें शामिल हो गईं। कुल मिलाकर 2600 जवान आज़ाद हिंद फौज में शामिल हो गए। कहा जाता है कि आज़ाद हिंद फौज में देश की किसी भी रेजीमेंट से सबसे ज्यादा सैनिक गढ़वाल राइफल के ही थे। गर्व की बात तो ये भी है कि इनमें से 600 सैनिक युद्ध में वीरगति को प्रार्त हुए थे। इतिहासकार कहते हैं कि आज़ाद हिंद फौज का ट्रेनिंग सेंटर सिंगापुर में था। इस ट्रेनिंग सेंटर की कमान भी एक उत्तराखंडी के हाथ में थी, जिनका नाम था लेफ्टिनेंट कर्नल चंद सिंह नेगी। बताया जाता है कि लेफ्टिनेंट कर्नल चंद सिंह नेगी के हाथ में अफसरों को ट्रेनिंग देने की जिम्मेदारी थी। इसी तरह से एक और उत्तराखंडी थे मेजर देब सिंह दानू। मेजर देब सिंह दानू आजाद हिंद फौज में पर्सनल गार्ड बटालियन के कमांडर के पद पर तैनात थे।

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सिर्फ इतना ही नहीं आजाद हिंद फौज में उत्तराखंड के अफसरों की तूती बोलती थी। लेफ्टिनेंट कर्नल बुद्धि सिंह रावत सुभाष चंद्र बोस के पर्सनल एड्यूजेंट की जिम्मेदारी संभालते थे। इसके अलावा ले. कर्नल पिपरी शरण रतूड़ी को आजाद हिंद फौज की फर्स्ट बटालियन का कमांडर बनाया गया था। ले. कर्नल पिपरी शरण रतूड़ी को माउडॉक के युद्ध में अदम्य शौर्य और वीरता दिखाने के लिए सरदार-ए-जंग की उपाधि मिली थी। खुद सुभाष चंद्र बोस ने ही उन्हें अपने हाथों से सम्मानित किया था। इसी तरह से एक और वीर थे मेजर पद्म सिंह गुसांई। मेजर पद्म सिंह गुसाईं आज़ाद हिंद फौज के थर्ड बटालियन के कमांडर थे। उस वक्त तत्कालीन ब्रिटिश सरकार में ज्वाइंट सेक्रेटरी के फिलिप मेशन ने कहा था कि ‘गढ़वाल राइफल के जवान देशप्रेम की भावना से प्रेरित थे, ऐसी भावना शायद कभी नहीं देखी जा सकती’।


Uttarakhand News: Garhwal rifle connection with azad hind fauj

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