Video: देवभूमि को प्रणाम करता है ये विदेशी, पहाड़ के संगीत को हमसे बेहतर जानता है..देखिए

Video: देवभूमि को प्रणाम करता है ये विदेशी, पहाड़ के संगीत को हमसे बेहतर जानता है..देखिए

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अमेरिका का एक शख्स उत्तराखंड के पारंपरिक संगीत के बारे में हमसे ज्यादा समझ रखता है। इनका नाम है स्टीफन फियोल..अमेरिका में इस शख्स का जन्म हुआ लेकिन उत्तराखंड आकर ये फ्योंली दास बन गए। भले ही स्टीफन फियोल का जन्म 80 के दशक में हुआ लेकिन उत्तराखंड से इनका नाता 88 साल पुराना है। 1930 में स्टीफन फियोल के दादाजी अपने बेटों के साथ उत्तराखंड आए थे। अमेरिका की सिनसिनाटी यूनिवर्सिटी में स्टीफन फियोल म्यूजिक प्रोफेसर के रूप में काम कर चुके हैं। ताज्जुब की बात ये है कि वो बीते 14 सालों से उत्तराखंड के पारंपरिक वाद्य यंत्रों को सीख रहे हैं। खास तौर पर ढोल और दमाऊं बजाने के मामले में स्टीफन फियोल का जवाब नहीं है। उन्होंने इसे सीखा और लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की है।

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14 साल तक उत्तराखंड के संगीत को समझने के बाद स्टीफन फियोल ने एक किताब लिखी, जिसका नाम है ‘रीकास्टिंग फोक इन द हिमालयाज़’। इस किताब में आपको उत्तराखंड के पारंपरिक संगीत और ढोल-दमाऊं के बारे में जानकारी मिलेगी। आप इस किताब को ऑनलाइन खरीद सकते हैं। स्टीफन फियोल साल 2003 में उत्तराखंड आए थे, वो यहां उत्तराखंड के संगीत को सीखना और समझना चाहते थे। वो देवप्रयाग में रहे और योगाचार्य भास्कर जोशी से ढोल सागर के इतिहास और बारीकियों को समझा। वो देवप्रयाग के उजार गांव गए और ढोल बजाने वाले सोहन लाल से ढोल की ताल सीखी। इसके साथ ही उन्होंने जागर सीखना शुरू कर दिया। उत्तराखंड से उन्हें इतना प्यार है कि वो यहीं के होकर रह गए। उन्होंने अपना नाम स्टीफन फियोल से बदल कर फ्योंली दास रख दिया। आज स्टीफ फियोल बेहतरीन गढ़वाली बोलते हैं।

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इसके बाद वो लोकगायक प्रीतम भरतवाण को अपने साथ अमेरिका लेकर गए। करीब एक महीने तक प्रीतम भरतवाण ने अमेरिका के छात्रों को ढोल दमाऊं सिखाया। सिनसिनाटी यूनिवर्सिटी के छात्रों के साथ मिलकर प्रीतम भरतवाण और स्टीफन फियोल ने तमाम अमेरिकी यूनिवर्सिटियों में ढोल-दमाऊं की कला का प्रदर्शन किया था। आपको जानकर खुशी होगी कि स्टीफन फियोल ढोल-दमाऊं पर भी एक किताब लिख चुके हैं। ये किताब ढोल दमाऊं की कला को सहेजने वाले ऐतिहासिक दस्तावेज बन गया है। इसी को लेकर स्टीफन फियोल एक शॉर्ट फिल्म बना रहे हैं। स्टीफन कहते हैं कि उत्तराखंड की ये कला ऐतिहासिक है। ये एक संचार माध्यम है, जिससे देवताओं को बुलाया जाता है। स्टीफन आज दीन-हीन हालत में पड़े ढोल-दमाऊं बजाने वालों की मदद भी कर रहे हैं। वास्तव में ऐसे लोगों के बारे में जानकर गर्व होता है।

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