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Image: Martyr bharat singh rawat story

उत्तराखंड शहीद..शरीर पर कई गोलियां लगी लेकिन लड़ता रहा..दुश्मनों को मारकर चला गया

उत्तराखंड शहीद..शरीर पर कई गोलियां लगी लेकिन लड़ता रहा..दुश्मनों को मारकर चला गया

ऐसी कहानियां, जो वीरों के लिए दिल में सम्मान पैदा करें...राज्य समीक्षा की हमेशा कोशिश रहती है कि उन शहीदों की कहानियां आपको बताएं, ताकि हमारे दिलों में इन जवानों की यादें जिंदा रहें। कारगिल युद्ध के बारे में तो आप जानते ही होंगे। ये वो युद्ध था, जिसमें उत्तराखंड के सबसे ज्यादा सैनिकों ने बलिदान दिया था। गृह मंत्रालय के आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं। इन्हीं में से एक वीर थे भरत सिंह रावत। उत्तराखंड के पुरख्याल गांव के रहने वाले भरत सिंह रावत नागा रेजीमेंट में तैनात थे। नागा रेजीमेंट को मई 1999 को जम्मू-कश्मीर के द्रास सेक्टर में तैनात किया गया था। इसी दौरान भारतीय सेना को आतंकियों की घुसपैठ की आहट मिली थी। भारतीय सेना कुछ समझ पाती, इससे पहले ही आतंकियों की तरफ से ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू हो गई।

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भरत सिंह रावत भी उसी रेजीमेंट के हिस्सा थे। वो युद्ध के दौरान अपने साथियों का हौसला बढ़ाते रहे और आतंकियों का एक एक कर खात्मा करते रहे। जिस वक्त ये लड़ाई चल रही थी, वो घनघोर रात का पल था। कुछ दिख नहीं रहा था और भारतीय सेना को काफी परेशानी हो रही थी। इसी दौरान पाकिस्तानी फौज ने भी गोलीबारी शुरू कर दी। यानी साफ तौर पर पता चल रहा था कि आतंकियों को पाकिस्तानी फौज कवर फायर दे रही है। लेकिन धन्य हैं भारतीय सेना ये जांबाज, जिन्होंने आंतकियों का तो खात्मा किया ही, साथ ही पाकिस्तान सेना को भी माकूल जवाब दिया। इस दौरान भरत सिंह रावत के शरीर पर कई गोलियां लग गई। इसके बाद भी हाथ में बंदूक लिए ये वीर जवान आगे बढ़ता रहा। अपने साथियों का हौसला बढ़ाता रहा।

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जब लगा कि अब भारतीय सेना जीत गई है, तो निढाल होकर ये वीर सपूत धरती पर गिर गया। हमारे जांबाजों ने दुश्मनों को परास्त कर दिया, लेकिन उत्तराखंड का ये योद्धा मातृभूमि पर अपनी जान न्योछावर कर चुका था। आपको जानकर हैरानी होगी कि भारी बर्फबारी की वजह से भरत सिंह रावत का पार्थिव शरीर एक महीने बाद उनके पैतृक गांव पुरख्याल पहुंचा था। शहीद भरत सिंह रावत की शहादत के बाद करीब साल तक उनकी पत्नी को किसी भी चीज का होश नहीं रहा। जरा सोचिए उस परिवार पर क्या बीती होगी, जिन्होंने अपने घर का चिराग खो दिया। बाद में उन्होंने खुद को संभाला और बच्चों की अच्छी शिक्षा पर अपना ध्यान लगाया। धन्य हैं उत्तराखंड के ये वीर सपूत और धन्य हैं उनकी वीरांगनाएं। देश को आप पर गर्व है। जय हिंद

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