चंदन सिंह रावत..उत्तराखंड का वो फुटबॉलर, जिसने ओलंपिक तक लिखी थी स्वर्णिम गाथा

चंदन सिंह रावत..उत्तराखंड का वो फुटबॉलर, जिसने ओलंपिक तक लिखी थी स्वर्णिम गाथा

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फुटबॉल वर्ल्ड कप का जूनून सभी के सिर पर सवार है लेकिन एक दौर वो भी था, जब उत्तराखंड में इस खेल की तूती बोलती थी। खासतौर पर देहरादून को इस खेल की नर्सरी कहा जाता था। आज भारत के कोलकाता शहर में आपको फुटबॉल की दीवनगी चरम पर देखने को मिलेगी लेकिन एक दौर था जब ऐसी चमक देहरादून में थी। एक आंकड़ा कहता है कि 60 के दशक में देहादून से इंटरनेशनल फुटबॉल को करीब 10 खिलाड़ी दिए थे। इन्ही में से एक थे चंदन सिंह रावत। एक मिडफील्डर, जिसकी तेज नजरें विरोधी टीम की हर काट ढूंढती थी और पैरों की तेजी तो बिजली के माफिक थी। चंदन सिंह रावत वो खिलाड़ी थे जिन्होंने पहले एशियन गेम्स (1951) दिल्ली में भारतीय टीम को स्वर्ण पदक दिलाया था। इसके अलावा 1952 में चंदन सिंह रावत हेल्सिंकी ओलंपिक में भारतीय टीम का हिस्सा थे। हालांकि हेल्सिंकी ओलंपिक में भारतीय टीम को यूगोस्लोवाकिया के आगे हार मिली थी।

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6 जुलाई 1926 को चंदन सिंह रावत का जन्म देहरादून में हुआ था। पिता आर्मी में थे तो अनुशासन पहले से ही था। देहारदून के गोरखा मिलिट्री कॉलेज से उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की थी। उस दौरान गोरखा रेजीमेंटल टीम और रॉयल गढ़वाल रेजीमेंटल टीम के बीच साल भर में तीन टूर्नामेंट होते थे। ‘The Gorkha Cup’, ‘The Nepal Cup’ और ‘The Garhwal Cup’। इन्हीं टूर्नामेंट को देख-देखकर चंदन सिंह रावत के दिल में फुटबॉल का जुनून उबाल मारने लगा था। जब चंदन सिंह रावत सिर्फ 12 साल के थे, तो उन्होंने अपने स्कूल की टीम की तरफ से पहला टूर्नामेंट खेला था। इसके बाद देहरादून के डीएवी पीजी कॉलेज की टीम से उन्होंने खेलना शुरू किया। एक टूर्नामेंट में तो चंदन सिंह रावत ने एक ही मैच में 9 गोल मार दिए थे। जब चंदन सिंह रावत फर्स्ट ईयर में थे तो उन्होंने गोरखा राइफल ज्वॉइन कर ली।

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दि्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उनकी तैनाती बर्मा में हुई। इस दौरान उन्हें अदम्य वीरता के लिए मेडल से भी सम्मानित किया गया। इसके साथ ही वो गोरखा रेजीमेंट की तरफ से फुटबॉल खेलते रहे। 1947 के दौरान जब भारत विभाजन हो रहा था। उस दौर के बारे में चंदन सिंह रावत ने बताया था कि ‘मेरे खेल को देखकर ब्रिटिश आर्मी मुझे अपने साथ ही रखना चाहती थी। मैं अपना देश छोड़ना नहीं चाहता था और उस वक्त मेरे पास सेना छोड़ने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं था।’ 1950 में जिंदगी में काफी उठापठक के बाद उन्होंने सेना छोड़ी। इसके बाद देश के लिए खेलना शुरू किया। 1951 में चंदन सिंह रावत एशियन गेम्स में भारतीय फुटबॉल टीम के सदस्य रहे और भारतीय टीम ने स्वर्ण पदक पर कब्जा किया। इसके बाद 1952 के हेल्सिंकी ओलंपिक में वो भारतीय टीम का हिस्सा रहे। ये बात सच है कि भारत में फुटबॉल को कभी संवारने की कोशिश नहीं की गई, वरना खिलाड़ी को बड़े कमाल के थे।


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