उत्तराखंड में शोक की लहर, नहीं रही पहाड़ की पहली लोकगायिका कबूतरी देवी

उत्तराखंड में शोक की लहर, नहीं रही पहाड़ की पहली लोकगायिका कबूतरी देवी

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उत्तराखंड ने एक विलक्षण प्रतिभा खो दी है। महान लोकगायिका कबूतरी देवी जी अब हमारे बीच नहीं रहीं। उन्हें सांस लेने और दिल में समस्या के चलते अस्पताल में भर्ती कराया गया था। डॉक्टरों की देखरेख में उनका इलाज चल रहा था। बताया जा रहा है कि 73 साल की कबूतरी देवी जी को सांस लेने में परेशानी हो रही थी। इसलिए अब कबूतरी देवी जी को इमरजेंसी में रखा गया था। अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही कबूतरी देवी की हालत बेहद खराब थी। राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित लोकगायिका कबूतरी देवी के अस्पताल में भर्ती होने की जानकारी मिलने के बाद लोक संस्कृति पर कार्य कर रहे कई लोगों ने अस्पताल पहुंचकर उनके शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना की थी। कबूतरी देवी मूल रुप से पिथौरागढ़ के मूनाकोट ब्लाक के क्वीतड़ गांव की निवासी हैं।

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इस गांव तक पहुंचने के लिए आज भी 6 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। जिस वक्त उत्तराखंड की कोई भी महिला संस्कृतिकर्मी आकाशवाणी के लिये नहीं गाती थीं। उस 70 के दशक में कबूतरी देवी जी ने पहली बार पहाड़ के गांव से स्टूडियो पहुंचकर रेडियो जगत में अपने गीतों से धूम मचा दी थी। कबूतरी देवी जी उत्तराखंड की पहली लोकगायिका हैं जिन्होंने पहाड़ के आम आदमी के गीतों को दुनिया में नई पहचान दी। पहाड के आम जनमानस में बसे लोकगीतॊं को पहली बार बाहर निकालने का श्रेय कबूतरी देवी जी को जाता है। आकाशवाणी के लिये कबूतरी देवी जी ने करीब 100 से ज्यादा गीत गाये थे। 1970-80 के दशक में उनके के गीत आकाशवाणी के रामपुर, लखनऊ, नजीबाबाद और चर्चगेट, मुंबई के केन्द्रों से प्रसारित हुए थे।

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उस वक्त कबूतरी देवी जी को एक गीत के लिए 25 से 50 रुपये मिलते थे। बाद में पति की मृत्यु हुई तो उन्होंने गाना बंद कर दिया था। पहाड़ को मन में बसाये कबूतरी जी को पहाड से बाहर जाना गवारा नहीं था। वो यहीं रही और पहाड़ की सेवा की। 1970-80 के दशक में नजीबाबाद और लखनऊ आकाशवाणी से कुमाऊंनी गीतों का एक कार्यक्रम प्रसारित होता था। एक खनकती आवाज हर किसी को बेहद पसंद आती थी। “पहाड़ों को ठण्डो पाणि, कि भलि मीठी बाणी” गीत आज भी हर किसी की जुबां पर आता है। उत्तराखण्ड की तीजन बाई कही जाने वाली श्रीमती कबूतरी देवी जी। कबूतरी देवी जी ने जो भी गीत गाये वे दादी-नानी से विरासत में मिले प्रकृति से संबंधित लोकगीत थे। उत्तराखंड के गीतों को नई पहचान देने वाली कबूतरी देवी को शत शत नमन

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