देहरादून: उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने एकजुट होकर अलग राजनीतिक विकल्प तैयार करने की दिशा में मंथन शुरू कर दिया है। उत्तराखंड क्रांति दल (उक्रांद) के आह्वान पर देहरादून में आयोजित ‘मंथन 2027: क्षेत्रीय एकता से उत्तराखंड का राजनीतिक विकल्प’ कार्यक्रम में 14 क्षेत्रीय दलों, सामाजिक संगठनों और जनसंगठनों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। बैठक में संभावित गठबंधन, साझा न्यूनतम कार्यक्रम और संयुक्त चुनावी रणनीति पर चर्चा हुई। हालांकि, गठबंधन को लेकर अभी अंतिम घोषणा नहीं हुई है।
Uttarakhand Regional Parties Plan Alliance for 2027 Elections
देहरादून स्थित जिला पंचायत भवन में रविवार को आयोजित कार्यक्रम का उद्देश्य उत्तराखंड की क्षेत्रीय राजनीतिक शक्तियों को एक मंच पर लाना और आगामी विधानसभा चुनाव के लिए साझा रणनीति की संभावनाएं तलाशना रहा। बैठक में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, राज्य आंदोलनकारियों और विभिन्न जनसंगठनों के प्रतिनिधियों ने अपने विचार रखे। वक्ताओं ने कहा कि प्रदेश के स्थानीय मुद्दों को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाने के लिए क्षेत्रीय दलों को आपसी मतभेदों से ऊपर उठकर संवाद और सहयोग करना होगा। बैठक में क्षेत्रीय दलों के बीच समन्वय बढ़ाने और लगातार बातचीत जारी रखने पर जोर दिया गया। प्रतिभागियों ने आगामी चुनाव में प्रभावी राजनीतिक विकल्प के रूप में आगे बढ़ने की बात कही। क्षेत्रीय दलों की इस पहल से चुनावी समीकरणों पर क्या असर पड़ेगा, यह गठबंधन की औपचारिक घोषणा और आगे की रणनीति पर निर्भर करेगा।
किन 14 दलों और संगठनों ने लिया हिस्सा?
कार्यक्रम में शामिल दलों और संगठनों में उत्तराखंड क्रांति दल, उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी, स्वाभिमान मोर्चा, राष्ट्रीय रिजनल पार्टी, समानता पार्टी, हिमालय क्रांति पार्टी, विकास पार्टी, राज्य आंदोलनकारी मंच, पूर्व सैनिक अर्धसैनिक संयुक्त सैनिक संगठन, बेरोजगार संघ, देवभूमि फाउंडेशन, पहाड़ स्वाभिमान सेना, गढ़-कुमाऊं एलायंस और कोटद्वार बचाओ संघर्ष समिति शामिल रहे। इन संगठनों के प्रतिनिधियों ने क्षेत्रीय मुद्दों पर एकजुट होकर काम करने और प्रदेश के हितों से जुड़े सवालों को प्रमुखता से उठाने की जरूरत बताई। आगे पढ़िए..
ये भी पढ़ें:
‘मेरी जमीन, मेरा अभिमान’ अभियान चलाएगा उक्रांद
कार्यक्रम में उत्तराखंड क्रांति दल ने जमीन और भू-कानून से जुड़े मुद्दों को लेकर ‘मेरी जमीन, मेरा अभिमान’ अभियान चलाने की घोषणा की। इसके तहत आम लोगों को भू-कानून से जुड़ी व्यवस्थाओं के प्रति जागरूक करने और स्थानीय लोगों को अपनी पुश्तैनी जमीन के संबंध में सोच-समझकर निर्णय लेने के लिए प्रेरित करने की बात कही गई। उक्रांद अध्यक्ष सुरेंद्र कुकरेती ने कहा कि राज्य के मूल निवासियों के अधिकार सुनिश्चित किए जाने चाहिए। उनके मुताबिक, स्थानीय लोगों की जमीनों को खुर्दबुर्द किए जाने की समस्या को गंभीरता से लेने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में राज्य के मूल निवासी भूमिहीन न हों, इसके लिए पार्टी लोगों के बीच जाकर जागरूकता अभियान चलाएगी। उक्रांद का कहना है कि जमीन, मूल निवास और स्थानीय अधिकारों से जुड़े मुद्दों को प्रदेश की राजनीति में प्रमुख स्थान मिलना चाहिए।
मूल निवास, भू-कानून और बेरोजगारी रहे प्रमुख मुद्दे
बैठक में उत्तराखंड से जुड़े कई अहम विषयों पर विचार-विमर्श किया गया। इनमें मूल निवास, सशक्त भू-कानून, जल-जंगल-जमीन पर स्थानीय जनता के अधिकार, पलायन, बेरोजगारी और परिसीमन जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। इसके अलावा प्रदेश के प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय लोगों के अधिकार और क्षेत्रीय हितों की रक्षा के सवाल भी उठाए गए। वक्ताओं ने कहा कि इन विषयों पर साझा रणनीति तैयार करने के लिए क्षेत्रीय दलों के बीच निरंतर संवाद जरूरी है।
क्या भाजपा और कांग्रेस को मिलेगी चुनौती?
उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले क्षेत्रीय दलों की एकजुटता की पहल राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यदि ये दल साझा कार्यक्रम और चुनावी रणनीति पर सहमति बना पाते हैं, तो राज्य के चुनावी समीकरणों पर इसका असर पड़ सकता है। हालांकि, भाजपा और कांग्रेस को प्रभावी चुनौती देने की क्षमता गठबंधन की औपचारिक संरचना, सीटों के बंटवारे, नेतृत्व और जनता के समर्थन जैसे कारकों पर निर्भर करेगी। फिलहाल देहरादून में हुई बैठक में क्षेत्रीय एकता और साझा राजनीतिक विकल्प की संभावनाओं पर चर्चा हुई है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि यह पहल आगे चलकर औपचारिक गठबंधन का रूप लेती है या नहीं।