उत्तरकाशी: हिमालयी पक्षियों के वितरण और ऊंचाई सीमा को लेकर एक नए अध्ययन ने महत्वपूर्ण जानकारी सामने रखी है। भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) से जुड़े शोधकर्ताओं के अध्ययन में गंगोत्री लैंडस्केप में कई पक्षी प्रजातियां अपनी पहले प्रकाशित ऊपरी ऊंचाई सीमा से ऊपर रिकॉर्ड की गईं।
Himalayan Birds Recorded Above Known Elevation Limits in Gangotri
अध्ययन के अनुसार, कुल 55 पक्षी प्रजातियों की 551 स्वतंत्र रिकॉर्डिंग मिलीं। इनमें 26 प्रजातियों की कम से कम एक रिकॉर्डिंग उनकी प्रकाशित ऊपरी ऊंचाई सीमा से अधिक ऊंचाई पर हुई। कुल 137 रिकॉर्डिंग ऐसी थीं, जो संबंधित पक्षियों की पहले दर्ज ऊंचाई सीमा से बाहर थीं। शोधकर्ताओं ने इसे हिमालयी पक्षियों के वितरण और ऊंचाई संबंधी मौजूदा वैज्ञानिक आंकड़ों को अपडेट करने के लिहाज से महत्वपूर्ण बताया है।
2500 से 5200 मीटर तक लगाया गया कैमरा ट्रैप
अध्ययन के लिए उत्तराखंड के भागीरथी बेसिन और गंगोत्री क्षेत्र में कैमरा ट्रैप का इस्तेमाल किया गया। सर्वेक्षण में अलग-अलग ऊंचाई और आवास वाले क्षेत्रों को शामिल किया गया। शोधकर्ताओं ने व्यवस्थित कैमरा ट्रैप निगरानी के जरिए पक्षियों की मौजूदगी का दस्तावेज तैयार किया। प्रकाशित शोध के अनुसार यह अध्ययन पांच साल की कैमरा ट्रैप सैंपलिंग पर आधारित था और इसमें ऊंचाई वाले दूरस्थ क्षेत्रों को भी शामिल किया गया।
सबसे बड़ा अंतर 3287 मीटर का
अध्ययन में किसी पक्षी की रिकॉर्ड की गई मौजूदगी और उसकी पहले प्रकाशित ऊपरी ऊंचाई सीमा के बीच अधिकतम अंतर 3287 मीटर दर्ज किया गया। इस तरह के रिकॉर्ड यह संकेत देते हैं कि हिमालयी पक्षियों की वास्तविक वितरण सीमा उन सीमाओं से अलग हो सकती है, जिन्हें पुराने सर्वेक्षणों और प्रकाशित आंकड़ों के आधार पर निर्धारित किया गया था। हालांकि, केवल इन रिकॉर्ड के आधार पर हर प्रजाति के ऊंचाई परिवर्तन को सीधे जलवायु परिवर्तन का परिणाम मानना उचित नहीं होगा। शोध का मुख्य महत्व यह है कि कैमरा ट्रैप से इन पक्षियों की वास्तविक मौजूदगी और वितरण के बारे में नए प्रमाण मिले हैं।
तीन पक्षियों की रेंज ने चौंकाया
अध्ययन में पश्चिमी ट्रैगोपैन, तिब्बती स्नोकॉक और तिब्बती सैंडग्राउज की मौजूदगी विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही। वैज्ञानिक अध्ययन में इन तीनों प्रजातियों की उत्तराखंड में रेंज एक्सटेंशन का फोटोग्राफिक प्रमाण दर्ज किया गया है। शोध के अनुसार पश्चिमी ट्रैगोपैन की पूर्वी वितरण सीमा पहले गढ़वाल हिमालय में गोविंद राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव विहार तक मानी जाती थी, लेकिन नए कैमरा ट्रैप रिकॉर्ड ने भागीरथी बेसिन में इसकी मौजूदगी की पुष्टि की। वहीं, तिब्बती स्नोकॉक और तिब्बती सैंडग्राउज को पहले मुख्य रूप से लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और सिक्किम के ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों से जोड़ा जाता रहा है। उत्तराखंड में इनकी कैमरा ट्रैप रिकॉर्डिंग ने इनके ज्ञात वितरण को विस्तार दिया है।
तिब्बती स्नोकॉक और सैंडग्राउज की भी मिली तस्वीरें
शोध के अनुसार तिब्बती स्नोकॉक की सात रिकॉर्डिंग और तिब्बती सैंडग्राउज की तीन रिकॉर्डिंग नेलांग घाटी में मिलीं। यह क्षेत्र करीब 3,500 से 5,200 मीटर की ऊंचाई वाला ट्रांस-हिमालयी इलाका है। इन दोनों प्रजातियों की मौजूदगी उत्तराखंड के उच्च हिमालय में कैमरा ट्रैप के जरिए दर्ज होना क्षेत्र की पक्षी जैव-विविधता को समझने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पश्चिमी ट्रैगोपैन की उत्तराखंड में रेंज हुई स्पष्ट
पश्चिमी ट्रैगोपैन हिमालय की महत्वपूर्ण और संरक्षण चिंता वाली पक्षी प्रजातियों में शामिल है। शोध में उत्तराखंड में इसकी मौजूदगी के नए फोटो प्रमाण सामने आए हैं। अध्ययन में पश्चिमी ट्रैगोपैन के 11 कैमरा ट्रैप रिकॉर्ड दर्ज किए गए। शोधकर्ताओं के अनुसार नए रिकॉर्ड इस प्रजाति की भौगोलिक सीमा को समझने में महत्वपूर्ण जानकारी जोड़ते हैं।
3500 मीटर पर Little Owl की भी तस्वीर
अध्ययन से जुड़े सर्वेक्षणों में गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र में करीब 3500 मीटर की ऊंचाई पर Little Owl की तस्वीर भी दर्ज की गई। इससे उत्तराखंड के उच्च हिमालय में पक्षियों की वास्तविक मौजूदगी और वितरण को लेकर नए तथ्य सामने आए हैं। ऐसे रिकॉर्ड खास तौर पर महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ऊंचाई वाले दुर्गम इलाकों में पारंपरिक पक्षी सर्वेक्षण करना चुनौतीपूर्ण होता है।
कैमरा ट्रैप से सामने आ रही पक्षियों की छिपी दुनिया
हिमालय के ऊंचे क्षेत्रों में पक्षियों की निगरानी के लिए कैमरा ट्रैप एक उपयोगी तकनीक साबित हो रही है। इन कैमरों के जरिए ऐसे इलाकों में भी प्रजातियों की तस्वीरें मिल सकती हैं, जहां नियमित फील्ड सर्वेक्षण सीमित रह जाते हैं। नए अध्ययन से यह भी स्पष्ट होता है कि पुराने प्रकाशित वितरण और ऊंचाई संबंधी आंकड़ों को लगातार फील्ड डेटा के आधार पर अपडेट करना जरूरी है। शोधकर्ताओं ने भागीरथी बेसिन में व्यवस्थित कैमरा ट्रैपिंग के जरिए तीन पक्षियों की रेंज एक्सटेंशन का दस्तावेज प्रस्तुत किया है।
क्या जलवायु परिवर्तन बदल रहा है हिमालयी पक्षियों का व्यवहार?
पक्षियों की ऊंचाई वाली रेंज में बदलाव को जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में देखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि तापमान और आवासीय परिस्थितियों में बदलाव से पर्वतीय प्रजातियों के वितरण पर असर पड़ सकता है। हालांकि, इस अध्ययन से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि दर्ज की गई हर ऊंचाई सीमा में बदलाव केवल जलवायु परिवर्तन के कारण हुआ है। नए रिकॉर्ड यह जरूर बताते हैं कि कुछ हिमालयी पक्षियों की वास्तविक मौजूदगी पुराने प्रकाशित आंकड़ों से कहीं अधिक व्यापक हो सकती है। इसलिए लंबे समय तक होने वाली निगरानी, दोहराए गए सर्वेक्षण और अलग-अलग वर्षों के डेटा की तुलना से यह समझना अधिक संभव होगा कि ये बदलाव स्थायी वितरण विस्तार हैं, मौसमी ऊंचाई परिवर्तन हैं या पर्यावरणीय परिस्थितियों से जुड़े अस्थायी बदलाव।
हिमालयी जैव-विविधता के लिए क्यों महत्वपूर्ण है अध्ययन?
गंगोत्री और भागीरथी बेसिन जैसे उच्च हिमालयी क्षेत्र जैव-विविधता की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं। यहां पक्षियों के वितरण में बदलाव को समझना संरक्षण योजना, आवास प्रबंधन और भविष्य की निगरानी के लिए उपयोगी हो सकता है। मार्च 2026 में Journal of Threatened Taxa में प्रकाशित अध्ययन ने विशेष रूप से पश्चिमी ट्रैगोपैन, तिब्बती स्नोकॉक और तिब्बती सैंडग्राउज की उत्तराखंड में रेंज एक्सटेंशन का दस्तावेज प्रस्तुत किया है। नए कैमरा ट्रैप रिकॉर्ड इस बात की ओर संकेत करते हैं कि हिमालयी पक्षियों के वितरण को समझने के लिए पुराने आंकड़ों के साथ आधुनिक और लगातार फील्ड मॉनिटरिंग को भी शामिल करना जरूरी है। आने वाले वर्षों में ऐसी निगरानी से यह स्पष्ट हो सकेगा कि इन प्रजातियों की ऊंचाई और भौगोलिक रेंज में दर्ज बदलाव किस हद तक स्थायी हैं।