नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने हरिद्वार की एक महिला सिविल जज के खिलाफ पारित बर्खास्तगी आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने पूरे मामले को “बिना नींव की बनाई गई संरचना” बताते हुए कहा कि यह न केवल सबूतों के अभाव का मामला है, बल्कि जांच प्रक्रिया गंभीर खामियों से भरी हुई थी।
Minor Abuse Case: Uttarakhand HC Sets Aside Dismissal
मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंद्र और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने सिविल जज की याचिका स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ की गई विभागीय कार्रवाई को अवैध ठहराया। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि— “यह केवल ‘नो एविडेंस’ का मामला नहीं है, बल्कि एक ऐसा प्रकरण है जिसे जानबूझकर बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया। इसे तिल का ताड़ बनाना भी कहा जा सकता है।” अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता को ऐसे आरोप में दोषी ठहराया गया, जो वास्तव में अस्तित्व में ही नहीं था।
जांच प्रक्रिया पर उठे गंभीर सवाल
हाईकोर्ट ने जांच रिपोर्ट को अविश्वसनीय बताते हुए कई गंभीर कमियों की ओर इशारा किया—
नाबालिग की मेडिकल जांच से जुड़े दस्तावेजों पर डॉक्टर के हस्ताक्षर नहीं थे
मेडिकल प्रमाणपत्र का मूल रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराया गया
किसी भी डॉक्टर का बयान दर्ज नहीं किया गया
मेडिकल केस हिस्ट्री और ओपीडी रिकॉर्ड गायब थे
जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड की मजिस्ट्रेट उपलब्ध होने के बावजूद बयान एक वरिष्ठ जज से दर्ज कराया गया
कोर्ट ने कहा कि घर में काम करने वाले कर्मचारियों और पड़ोसियों जैसे सर्वोत्तम गवाहों से पूछताछ न करना, जांच की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है।
पुलिस कार्रवाई को बताया अतिरेक
हाईकोर्ट ने इस मामले में की गई पुलिस कार्रवाई पर भी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि बिना किसी वैध आदेश के भारी पुलिस बल के साथ हथियारबंद जवानों द्वारा घर को घेरना अधिकारों का दुरुपयोग है।
हाईकोर्ट का आदेश: बहाली और सेवा लाभ
अदालत ने स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा—
सेवा से हटाने का आदेश रद्द किया जाता है
विभागीय जांच रिपोर्ट निरस्त की जाती है
याचिकाकर्ता को बर्खास्तगी की तारीख से निरंतर सेवा में माना जाएगा
वरिष्ठता और सभी परिणामी सेवा लाभ बहाल होंगे
वेतन सहित 50 प्रतिशत मौद्रिक लाभ दिए जाएंगे।
जानिए क्या था मामला
दरअसल साल 2018 में एक गुमनाम ई-मेल के माध्यम से शिकायत मिली थी, जिसमें आरोप लगाया गया कि हरिद्वार की सिविल जज ने एक नाबालिग लड़की को घरेलू सहायिका के रूप में रखा और उसके साथ शारीरिक उत्पीड़न किया। शिकायत के बाद जिला जज ने पुलिस टीम के साथ मौके का निरीक्षण किया, जिसके आधार पर महिला जज को निलंबित कर विभागीय कार्रवाई शुरू की गई थी।
न्यायपालिका के लिए अहम संदेश
हाईकोर्ट का यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया में निष्पक्षता और पारदर्शिता का मजबूत संदेश देता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बिना ठोस सबूत और वैधानिक प्रक्रिया के किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं की जा सकती।