उत्तराखंड उधमसिंह नगरHigh Court honorably acquits rape accused

उत्तराखंड: मां और 8 साल की बच्ची से दुष्कर्म, हुई थी उम्रकैद.. अब हाईकोर्ट ने किया 'बाइज्जत' बरी

नैनीताल हाईकोर्ट ने माना कि निचली अदालत द्वारा दी गई सजा न्याय-संगत नहीं है। इसलिए कोर्ट ने आरोपी को दोषमुक्त कर बाइज्जत बरी करने के आदेश दिया।

High Court decision: High Court honorably acquits rape accused
Image: High Court honorably acquits rape accused (Source: Social Media)

उधमसिंह नगर: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 8 वर्षीय मासूम बच्ची के साथ दुराचार के मामले में निचली अदालत द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को रद्द करते हुए आरोपी बुजुर्ग को बाइज्जत बरी करने के निर्देश दिए हैं। खंडपीठ ने यह फैसला मामले से जुड़े गवाहों के विरोधाभासी बयानों को देखते हुए दिया।

High Court honorably acquits rape accused

दरअसल उधम सिंह नगर जिले के दिनेशपुर निवासी अमल बढोही के खिलाफ एक बुजुर्ग महिला ने अपनी बेटी और 8 वर्षीय नातिन के साथ दुराचार करने के आरोप में शिकायत दर्ज कराई थी। बुजुर्ग महिला द्वारा दी गई तहरीर के आधार पर पुलिस ने पॉक्सो एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर अमल बढोही को गिरफ्तार किया। उस समय आरोपी की उम्र लगभग 68 वर्ष थी। लेकिन इस मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य रिपोर्टकर्ता बुजुर्ग महिला, उसकी बेटी और अन्य गवाह अपने आरोपों से मुकर गए। इसके बावजूद निचली अदालत ने पीड़िता के बयान और मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर आरोपी को दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

हाईकोर्ट ने आरोपी को किया दोषमुक्त

आरोपी अमल बढोही की ओर से नैनीताल हाईकोर्ट में दलील दी गई कि कथित घटना की रिपोर्ट 42 दिन की देरी से दर्ज की गई थी। पीड़िता के बयान (धारा 164 CrPC के तहत) भी कई दिन बाद लिए गए। शिकायतकर्ता और उनकी ओर से पेश किए गए गवाह बाद में अपने आरोपों से पीछे हट गए। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए नैनीताल हाईकोर्ट ने माना कि निचली अदालत द्वारा दी गई सजा न्याय-संगत नहीं है। इसलिए न्यायमूर्ति रविंद्र मैठाणी और न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की खंडपीठ ने आरोपी को दोषमुक्त कर बाइज्जत बरी करने के आदेश जारी किए।

हाईकोर्ट को लेना चाहिए स्वत संज्ञान

"इस मामले को देखते हुए साफ है कि आरोपी अमल बढोही ने मां और बेटी के साथ जघन्य अपराध किया था। नैनीताल हाईकोर्ट को इसमें स्वत संज्ञान लेते हुए मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए इस पर पुनर्विचार करना चाहिए। इसके साथ ही परिवार की काउंसलिंग करके यह पता करने की कोशिश की जानी चाहिए कि की परिवार किस प्रकार के दबाव और यातना से जूझकर अपने बयान बदलने पर मजबूर हो रहा है।"