आते ही सभी के दिलों पर छाया ये गढ़वाली गीत..कुछ ही दिनो में 1 लाख लोगों ने देखा

आते ही सभी के दिलों पर छाया ये गढ़वाली गीत..कुछ ही दिनो में 1 लाख लोगों ने देखा

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उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र का एक बेहद ही पुराना गीत। उत्तराखंड के महान गीतकार स्व.श्री चंद्र सिंह राही जी द्वारा इस गीत को गाया गया था। साल 1983 में बनी पहली गढ़वाली फिल्म जग्वाल में इस गीत को सतिंदर फंड्रियाल जी द्वारा भी गाया गया था। ‘बो ए नी जाणुं, नी जाणुं...बल पंचमी का मेला, मेरी बोऊ सुरेला’। ना जाने इस गीत को हर पहाड़ी कब से गुनगुनाता जा रहा है। इस गीत को अब नए संगीत में पिरोने का काम किया है सौरभ मैठाणी ने। सौरभ मैठाणी एक नया और उभरता हुआ चेहरा हैं, जो उत्तराखंड के संगीत के लिए बेहतरीन काम कर रहे हैं। गीत को दो तीन लोकेशन तक सीमित रखकर खूबसूरत बनाने की कोशिश की गई है। पानी के बीच में पूरे बैंड का खूबसूरत तरीके से फिल्मांकन किया गया है। कम बजट में एक अच्छा वीडियो बनकर तैयार हुआ है।

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सौरभ मैठाणी के साथ साथ इस गीत में विनोद चौहान का संगीत, सुभाष पांडे की रिदम, विकास उनियाल का कैमरा और एडिटिंग कमाल की है। इस गीत के प्रोड्यूसर संजीव नेगी है। कुल मिलाकर कहें तो अगर आप अपने कदमों को थिरकाना चाहते हैं, तो सौरभ मैठाणी का ये गीत आपके लिए बना है। आप भी देखिए।

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