Video: पहाड़ की परंपरा का सिपाही, जिसने दुनिया को दिखाया उत्तराखंड का ‘महाकौथिग’

Video: पहाड़ की परंपरा का सिपाही, जिसने दुनिया को दिखाया उत्तराखंड का ‘महाकौथिग’

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महाकौथिग...दिल्ली-एनसीआर में सर्दियां आते ही लोगों के बीच चर्चाएं शुरु हो जाती है कि महाकौथिग जाना है। दिल्ली में रहने वाले तमाम पहाड़ी लोग इस बात से अच्छी तरह से वाकिफ हैं कि सर्दियों के बीच में एक ऐसा वक्त आता है, जब उत्तराखंड के गीतों पर दिल्ली झूमने लगती है। ये सब कुछ संभव हो पाया राजेंद्र चौहान के अथक परिश्रम की वजह से। राजेंद्र चौहान उत्तराखंड की लोकप्रिय गायिका कल्पना चौहान के पति हैं। उत्तराखंड की संस्कृति को देश-विदेश तक पहुचाने का सपना देखा था राजेंद्र चौहान ने। काम तो बड़ा मुश्किल था लेकिन जो अपने लक्ष्य तक ना पहुंच पाए, तो वो कैसा पहाड़ी? अल्मोड़ा के रहने वाले राजेंद्र कोटद्वार आए थे और 30 साल पहले दिल्ली के नोएडा चले गए थे। धीरे धीरे दिल्ली में उन्होंने उत्तराखंड के समाज के लोगों को अपने साथ जोड़ना शुरू किया। राज्य समीक्षा से बातचीत के दौरान राजेंद्र चौहान ने कहा कि 30 साल पहले का दौर कुछ अलग था।

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दिल्ली जाकर पहाड़ियों को एक किया:- राजेंद्र चौहान कहते हैं कि उस दौरान लोग पहाड़ी बोलने में शरमाते थे। इसके बाद भी उन्होंने घर घर जाकर लोगों से संपर्क करना शुरू किया। जब उन्हें लगा कि अब दिल्ली में उत्तराखंड के नाम कोई आयोजन करना चाहिए तो साल 2004 में कौथिग नाम से एक प्रोग्राम की शुरुआत हुई। इस आयोजन में उत्तराखंड के लोगों की मौजूदगी ने साबित कर दिया कि आने वाला वक्त और भी बड़ा हो सकता है। इसलिए धीरे धीरे वो अपने मन में एक नई सोच को जन्म देते रहे। साल 2011 में दिल्ली में उत्तराखंड का सबसे बड़ा कल्चरल फेस्टिवल शुरू हो गया। इसे नाम दिया गया महाकौथिग। अब सवाल ये है कि महाकौथिग क्यों खास है ? उत्तराखंड की खोई हुई परंपरा आपको यहां दिखेगी। पहाड़ी गीत, पहाड़ी माहौल, पहाड़ी खान पान, पहाड़ी वेशभूषा में सजी महिलाएं, नथ, पिछोड़ा, गुलबंद, झंवरी, पऊंची हर तरह के पहाड़ी आभूषण आपको महाकौथिग दिखेंगे।

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उत्तराखंड के लिए क्यों खास है महाकौथिग:- पहाड़ के लोग महाकौथिग में पहाड़ी खाद्य सामग्री जैसे पहाड़ी दालें, पहाड़ी सब्जियां, पहाड़ी फल और कई चीजें बेच सकते हैं। इसके अलावा खास बात ये भी है कि उत्तराखंड के लोगों को रोजगार देने में राजेंद्र चौहान एक अहम भूमिका निभा रहे हैं। आज उनके पास 100 लोगों की टीम है और सभी उत्तराखंड से हैं। राजेंद्र चौहान कहते हैं कि ये एक ऐसा आयोजन है, जिसे तैयार करने में लाखों का खर्च आता है। कई बार तो हिम्मत जवाब दे देती है। साल 2014 और साल 2017 में तो महाकौथिग के लिए उन्होंने मना कर दिया था लेकिन दिल्ली में रह रही उत्तराखंड की कई महिलाओं ने कहा कि ‘राजेंद्र जी आप कोशिश कीजिए, हम हर संभव आपकी मदद के लिए तैयार हैं।’ ये बातें राजेंद्र जी को प्रेरणा देने का काम करती हैं। उनमें जोश का संचार करती हैं। आलम ये है कि राजेंद्र चौहान को लोग अब पहाड़ का सास्कृतिक क्रांतिकारी कहने लगे हैं।

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पहाड़, पर्यटन, रोजगार और महाकौथिग:- आप अगर दिल्ली में होने वाले महाकौथिग गए हैं, तो आप जानते होंगे कि ये कैसा भव्य होता है। कभी केदारनाथ मंदिर जैसा बना स्टेज, कभी बद्रीनाथ मंदिर की शक्ल और उम्मीद है कि इस बार जागेश्वर मंदिर जैसा स्टेज तैयार हो सकता है। दिसंबर के वक्त दिल्ली-एनसीआर के इंदिरापुरम में इस विशाल मेले का आयोजन होता है। राजेंद्र चौहान का कहना है कि अब सरकार को भी इसमें कुछ मदद करनी चाहिए। इसके बाद ही उत्तराखंड में भी महाकौथिग का सपना साकार होगा। पहाड़, पयर्टन और रोजगार के लिए राजेंद्र चौहान क्या कर रहे हैं? आप भी ये वीडियो देखिए।

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