चमोली के युवाओं ने पलायन को दिखाया आइना, पहाड़ के हर गांव को चाहिए ऐसे नौजवान

चमोली के युवाओं ने पलायन को दिखाया आइना, पहाड़ के हर गांव को चाहिए ऐसे नौजवान

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पलायन की मार से बुरी तरह पीड़ित चमोली में पोखरी के कैलब गाँव के नौजवानों ने गाँव को पुनर्स्थापित करने और उसके पुराने गौरव को वापस लौटाने के लिए संकल्पबद्ध होकर कमर कस ली है। 9 दिवसीय धार्मिक अनुष्ठान की पूर्णाहुति को गाँव के विकास को समर्पित करते हुए ग्रामीणों ने संकल्प लिया है कि आजीविका के लिए चाहे वे कहीं भी रहेंगे लेकिन गाँव के विकास के लिए संगठित होकर कार्य करेंगे। इसके लिए आम सभा द्वारा एक कार्यकारिणी का गठन भी किया गया है, जो सबसे पहले कैलब गाँव को मोटर मार्ग से जोड़ने और बंजर पड़ी उपजाऊ कृषि भूमि को चाय बागान बनाने के लिए आवश्यक कार्यवाही करेगी। कार्यकारिणी में नौजवानों ने ही मुख्य रूप से जिम्मेदारी ली है। कार्यकारिणी के मार्गदर्शन के लिए बुजुर्गों का एक संरक्षक मंडल बनाया गया है। ग्राम विकास समिति के नाम से एक संस्था बनाकर उसे विधिवत पंजीकृत किये जाने का निर्णय भी आम सभा द्वारा लिया गया है।

11 पीढ़ी पहले बसे कैलब गाँव का अपना एक विशिष्ट गौरवपूर्ण इतिहास रहा है। अपनी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए इस गाँव के पूर्वजों ने जल, जंगल और जमीन के बेहतर उपयोग के द्वारा पूरे क्षेत्र में एक विशिष्ट पहचान बनाई थी। ज्योतिष विद्या के प्रकांड विद्वान प. भोला दत्त गैरोला को पूरे अपर गढ़वाल में विशेष सम्मान के साथ देखा जाता था। संस्कृत के अनेक विद्वान इस गाँव की प्रतिष्ठा को आगे बढ़ाते रहे। इस गाँव की रामलीला लंबे समय तक पूरे इलाके में अपनी विशिष्ट पहचान के लिए प्रख्यात रही। बाद में कृषि भूमि कम होते जाने तथा नौकरियों का सिलसिला बढ़ते जाने के साथ इस गाँव के लोगों ने भी कदम मिलाते हुए उसमें भागीदारी निभाई। सेना में भी इस गाँव के जाँबाजों ने अपने शौर्य का परिचय दिया। दूसरे विश्व युद्ध में इस इलाके के 6 जूनियर कमीशंड अफसरों में से 3 कैलब गाँव के थे। सिविल सेवाओं में भी इस गाँव के लोग अग्रिम पंक्ति में रहे।

पूरे नागपुर परगने के दो वरिष्ठ पत्रकारों में से एक इसी गाँव से हुए। अभी भी बड़ी संख्या में शिक्षक, सैनिक, पूर्व सैनिक, नागरिक सेवाओं के कर्मचारी इस गाँव से हैं। समय के साथ कदम मिलाकर चलने की प्रचुर क्षमता वाला गाँव कैलब सरकारी उपेक्षा का शिकार होकर इस समय पलायन की त्रासदी से सबसे अधिक प्रभावित है। 60-65 सम्पन्न परिवारों के इस गाँव मे इस समय केवल दो परिवार रह गए हैं और वे भी सरकारी उपेक्षा के कारण गाँव छोड़कर भाग जाने को आतुर हैं। उनकी सबसे बड़ी समस्या यातायात की सुविधा का अभाव है। इस गाँव को मोटर सड़क से न जोड़े जाने के कारण यहाँ जीवन यापन करना कठिन हो गया है। इसी के चलते आजादी के 70 वर्षों में यहाँ डी एम या विधायक के कदम पहली बार अब पड़े हैं, जब पूरे देश और विदेशों तक फैले कैलब-हरिशंकर वासियों ने रिवर्स पलायन के लिए कमर कसी और इसकी शुरूआत 9 दिवसीय धार्मिक कार्यक्रम से की।

इसमें न केवल गाँव से 4-5 दशकों से बिछुड़े लोग शामिल हुए, बल्कि अन्य गाँवों के लोग, संबंधी, मीडिया प्रतिनिधि भी पहुँचे और इस गाँव के नौजवानों की पहल की प्रशंसा करने के साथ-साथ उन्होंने इसमें हर संभव सहयोग देने तथा इसका अनुकरण अपने गाँवों में करने का विचार भी व्यक्त किया है। ग्रामीणों का कहना है कि सरकार रिवर्स पलायन के गीत खूब गुनगुना रही है लेकिन हम इसे अमलीजामा पहनाने के लिए मनोयोगपूर्वक जुट गए हैं। सरकार केवल गाँव तक मोटर मार्ग बना दे, बाकी इस गाँव को आधुनिक विकास के रास्ते पर चलाने की जिम्मेदारी वे स्वयं लेने को तैयार हैं। अब कैलब गाँव वालों ने विकास की गेंद सरकार के पाले में डाल दी है और विधायक तथा जिलाधिकारी को भी अपनी मंशा से परिचित करा दिया है। अब यह देखना होगा कि सरकार इस पहल पर कितना सकारात्मक रुख अख्तियार करती है? (नोट: वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार रमेश पहाड़ी जी के फेसबुक वॉल से साभार।)


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