पहाड़ की बेटी ने लिखी कामयाबी की बुलंद कहानी, छोटे से काम को बेमिसाल बना दिया

पहाड़ की बेटी ने लिखी कामयाबी की बुलंद कहानी, छोटे से काम को बेमिसाल बना दिया

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ऊन...जी हां ऊन, किसी के लिए ये बेहद क़ीमती है, तो किसी के लिए महज रुई का एक फ़ाहा। लेकिन आज अगर आप ऊन की सही कीमत जानना चाहते हैं, तो उन महिलाओं से मिलिए, जो इसके जरिए सिर्फ कमाई नहीं कर रही, बल्कि देश और दुनिया में उनकी पहचान हो रही है। किसी भी रास्ते पर कदम बढ़ाने से पहले हौसलों की जरूरत होती है। सही सोच, सही फैसला, सही वक्त और कभी ना टूटने वाले हौसले ही आपको कामयाबी के शिखर पर ले जाते हैं। राज्य समीक्षा के लेखों में हम आपको अक्सर ऐसी कहानियों से रू-ब-रू कराते रहते हैं। ऐसी ही एक बेटी है अभिलाषा बहुगुणा। जैसा नाम, वैसा ही काम करने का अंदाज। टिहरी गढ़वाल से ताल्लुक रखने वाली अभिलाषा के दादा जी स्वतंत्रता सेनानी रह चुके हैं। माता और पिता दोनों ही शिक्षा के क्षेत्र में हैं। अभिलाषा के पति प्रसन्ना जी IAS ऑफिसर हैं।

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साल 2015 से 2017 के बीच प्रसन्ना लद्दाख में पोस्टेड थे। इस दौरान ही दोनों पति-पत्नी ने मिलकर स्थानीय महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ने के लिए बेहतरीन काम किया। इस प्रोजक्ट का नाम दिया गया ‘लूम्स ऑफ लद्दाख’। इसका उद्देश्य ये था कि स्थानीय बुनकरों को उनकी मुख्यधारा में जोड़ा जाए। राज्य समीक्षा से बात करते हुए अभिलाषा कहती हैं कि लद्दाख में पश्मीना तो है, लेकिन लोग दूसरों के लिए मजदूरी करने को मजबूर थे। सोच ये थी कि इन सभी को एक किया जाए, जिससे सीधा फायदा लोगों को ही मिल सके। लद्दाख से जुड़े सीमावर्ती इलाकों के बुनकर ही सबसे बेमिसाल और पारंपरिक बुनाई के लिए मशहूर हैं। लेकिन हैरानी ये थी कि वहां भी पलायन हो रहा था। रोजगार की तलाश में लोग घर छोड़कर जा रहे थे। खास बात ये है कि स्थानीय लोग अपने पारंपरिक काम को आगे नहीं बढ़ाना चाहते थे।

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अब इस काम के लिए सिर्फ महिलाएं ही बची थीं। आखिरकार प्रसन्ना और अभिलाषा बहुगुणा ने मिलकर दिन-रात इस बारे में सोचना शुरू किया। लोगों तक पहुंच बनाना शुरू कर दिया और धीरे धीरे ये मुहिम रंग लाने लगी। स्थानीय महिलाएं और बुनकर धीरे धीरे अभिलाषा और प्रसन्ना के प्रोजक्ट ‘लूम्स ऑफ लद्दाख’ से जुड़ने लगे। आज 8 गावों की करीब 152 महिलाएं इस प्रोजक्ट के तहत काम कर रही हैं। महिलाओं को सीधा फायदा मिल रहा है। अभिलाषा कहती हैं कि उनका लक्ष्य स्थानीय ऊन को प्रमोट करना था। ये काम कुछ इस तरह से आगे बढ़ा कि बाकी डिपार्टमेंट्स को भी इस बारे में पता चला। डिपार्टमेट्स को ये भी पता चला कि आखिर किस तरह से इसे स्वरोजगार का बड़ा माध्यम बना सकते हैं। लूम्स ऑफ लद्दाख, प्रोजक्ट लक्साल आज कामयाबी की बुलंदियों पर है।

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लोग इस प्रोजक्ट के तहत काम करना चाहते हैं। इसके बाद अभिलाषा की मुलाकात उत्तराखंड के सलिल डोभाल से हुई। सलिल डोभाल पांडवाज़ ग्रुप की अहम कड़ी भी हैं। यहां से इस प्रोजक्ट यानी लूम्स ऑफ लद्दाख को लेकर एक डॉक्यूमेंट्री भी तैयार हुई, जिसे लोगों ने काफी पसंद भी किया। अब देश के अलग अलग शहरों तक ‘लूम्स ऑफ लद्दाख’ पहुंच रहा है। अभिलाषा कहती हैं कि अब अलग अलग, डिजायनर्स से मुलाकात हो रही है। यहां तक कि विदेशों में भी इसकी डिमांड बढ़ रही है। महिलाएं और भी मजबूत हो रही हैं, गांव के गांव इस पहल से जुड़ रहे हैं, स्वरोजगार का एक बेहतरीन उदाहरण अभिलाषा बहुगुणा और प्रसन्ना रामास्वामी द्वारा पेश किया गया। आज लद्दाख की महिलाओं की कमाई बढ़ रही है, काम दिन-दोगुना और रात-चौगुना तरक्की कर रहा है। इस बेहतरीन काम के लिए ‘लूम्स ऑफ लद्दाख’ टीम को ढेर सारी शुभकामनाएं। यू हीं प्रगति पर पथ पर आगे बढ़ते रहिए।


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