उत्तराखंड की वो शक्तिपीठ… जहां हर रात विश्राम करती हैं महाकाली !

उत्तराखंड की वो शक्तिपीठ… जहां हर रात विश्राम करती हैं महाकाली !

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नवरात्र का वक्त चल रहा है। इस दौरान मां की साधना में सभी तल्लीन रहते हैं। कहा जाता है कि इस दौरान देवी मां से जुड़ी उन कहानियों और उन मंदिरों के बारे में जानना चाहिए, जहां आज भी मां का जागृत रूप मौजूद है। इसलिए आज हम आपको एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं। जिसके बारे में कहा जाता है कि यहां महाकाली रात्रि विश्राम करती हैं। उत्तराखंड के गंगोलीहाट में काली मां दरबार कहा जाने वाला हाटकाली मंदिर है। यहां महाआरती के बाद महा काली का बिस्तर लगाया जाता है। सुबह ये बिस्तर ऐसा दर्शाता है कि मानों यहां साक्षात काली मां विश्राम करके गई हों। बिस्तर में सलवटें पडी रहती हैं। गंगोलीहाट से करीब 1 किलोमीटर दूर ये मंदिर है। अगर आप यहां आ रहे हैं तो साफ मन से मां की आराधना करें। कहा जाता है कि अगर यहां आने वाले श्रद्धालु सच्चे मन से मां की आराधना करें तो जीवन के सारे दुख दूर हो जाते हैं।

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कहा जाता है कि इस मंदिर की स्थापना जगतगुरू शंकराचार्य ने खुद की थी। कहा जाता है कि यहां देवी मां शालीन और सौम्य हैं। कहा ये भी जाता है कि विशेष मौके पर देवी मां भयानक रूप भी धारण करती है। सुबह के वक्त यहां शंख और नगाडों की रहस्यमयी आवाजें निकलती हैं। इसके बाद यहां भक्तों का आना शुरू होता है। शाम की आरती का वक्त भी मन मोहने वाला होता है। यकीन मानिए अगर आप सांसारिक दुखों से तंग आ चुके हैं, तो मन से मां की आराधना करें। नवरात्रों में और चैत्र महीने की अष्टमी को यहां भक्तों का तांता लगा रहता है। इस दौरान गंगोलीहाट में बाजार सज जाते हैं और स्थानीय लोग इसे हाट कौथिग के नाम से बुलाते हैं। ये मंदिर अपने आप में एक पौराणिक कहानी समेटे हुए है। कहा जाता है कि जब भगवती काली मां ने महिषासुर, चण्ड मुण्ड, शुम्भ निशुम्भ जैसे राक्षसों का वध किया था, तो इसके बाद भी उनका रौद्र रूप शांत नहीं था।

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उन्होंने भयंकर ज्वाला का रूप धारण कर दिया था और तांडव मचा दिया था। कहा जाता है कि इसके बाद मां ने देवदार के वृक्ष में चढ़कर जग्गनाथ और भुवनेश्वर नाथ को आवाज लगानी शुरू की। इसके बाद जगतगुरू शंकराचार्य ने योगसाधना के बल पर शक्ति के दर्शन किये और मां के रौद्र रूप को शांत किया। इसके बाद मंत्रोचार के द्वारा मां को यहां प्रतिस्ठापित किया। इस मंदिर में सहस्त्र चण्डी यज्ञ, शतचंडी महायज्ञ, सहस्रघट पूजा, अष्टबलि अठवार का पूजन आयोजित किया जाता है। इस दौरान मंदिर की आभा देखने लायक होती है। इस कालिका मंदिर के पुजारी स्थानीय रावल उपजाति के लोग हैं। सरयू और रामगंगा के बीच गंगावली की सुनहरी घाटी में ये मंदिर स्थित है। इस स्थल की बनावट त्रिभुजाकार बतायी जाती है। ये ही त्रिभुज तंत्र शास्त्रों के मुताबिक माता का साक्षात् यंत्र है। महाकाली के इस मंदिर में भक्तों की अपार आस्था जुड़ी हुई है।


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