फैशन डिजाइनिंग छोड़ गाँव में शुरू किया बकरी पालन, आज लाखों रुपए है आमदनी

फैशन डिजाइनिंग छोड़ गाँव में शुरू किया बकरी पालन, आज लाखों रुपए है आमदनी

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उत्तराखण्ड... जहां रोजगार की तलाश में हर महीने हजारों लोग शहर की ओर पलायन करते हैं। जहां पलायन की समस्या एक चुनावी मुद्दा है और हर बार चुनाव से पहले इस समस्या से लड़ने के वादों की झड़ी सी लग जाती है। लेकिन कहते हैं जहां समस्या होती है वहीँ आस-पास ही उस समस्या से पार पाने का तरीका भी होता है... इस बात को उत्तराखंडी युवा बार-बार साबित करते आये हैं। बार-बार पहाड़ी युवाओं ने अपनी नई सोच से पलायन की समस्या से पार पाने का तरीका सुझाया है। रोजगार के साधन पैदा किये हैं। गाँव में रोजगार के साधन नहीं हैं ... इस धारणा को पूरी तरह से खत्म करने का जज्बा दिखाया है नई पीढ़ी के पहाड़ी युवाओं ने। आए दिन हमें तरह-तरह की किस्से सुनने को मिलते हैं, जहाँ लोग शानदार शहरी जीवन को छोड़ कर गाँव की ओर रुख करते हैं और प्राकृतिक संसाधनों का सही इस्तेमाल कर अपना खुद का कारोबार शुरू कर लेते हैं। इन्हीं जिंदादिल युवाओं में एक नाम है श्‍वेता तोमर। श्‍वेता देहरादून के पास ही भानियावाला में रहती हैं। आज महानगरों में महज कुछ हजार रुपयों के लिए भटक रहे युवाओं के लिए श्‍वेता ने एक मिसाल कायम कर दी है।

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आज के स्टाइल-परस्त युग में बड़े शहर में फैशन डिजाइनिंग जैसे शानदार कैरियर को छोड़ कर गाँव में बकरी पालन शुरू करने की कोई बात करे तो कोई विश्वास नहीं करेगा। इस धारणा को खत्म किया उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून के पास के ही कस्बे रानीपोखरी में जन्‍मी श्‍वेता ने। श्‍वेता ने अपने पिता के सपने को जिया... उसे साकार किया। श्‍वेता के पिता का हमेशा से यह सपना था कि गाँव में कोई ऐसा कारोबार हो जिससे युवाओं को रोजगार के अवसर मिल सकें। पिता कारोबार स्थापित करने में असफल रहे, लेकिन बेटी के जेहन में पिता के सपने को पूरा करने की ललक हमेशा रही। बचपन से ही श्‍वेता को फैशन डिजाइनिंग में काफी रुची थी। विज्ञान में स्नातक और उसके बाद NIFT से फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करने के बाद उन्होंने नोएडा और दिल्ली में कुछ साल फैशन इंडस्ट्री में काम किया। डिजाइनिंग का काम करने के दौरान ही उनका मिस चंडीगढ़ के लिए भी सेलेक्‍शन हुआ। शादी के बाद उन्होंने बेंगलुरु में बुटीक चलाना शुरू किया। श्‍वेता हर महीने अच्‍छी खासा कमाने लगी। लेकिन मन में हमेशा से अपने पिता की ख्‍वाहिश पूरी करने की इच्छा रही। एक दिन श्‍वेता के मन में गाँव में फार्म शुरू करने का आइडिया आया और उसने अपने पति से इसे साझा किया।

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आज श्‍वेता की फार्म में 400 से ज्‍यादा बकरियां हैं। उन्होंने डेयरी का बिजनेस भी इससे जोड़ दिया है। इतना ही नहीं अब वो मुर्गी और गौ-पालन भी कर रही हैं। आज की तारीख में उनका सालाना टर्न-ओवर 10 से 15 लाख तक पहुँच गया है। आज श्‍वेता एक सफल किसान हैं, युवाओं के लिए एक मिसाल कायम करते हुए श्‍वेता तोमर एक ऐसे पायदान तक पहुँच चुकी हैं जहां उनके सामने शानदार भविष्य है। अपने उत्तराखण्ड में पलायन की समस्या से पार पाने का सरल उपाय बताते हुए जब उन्होंने गाँव में फ़ार्म की शुरुआत की तो कई लोगों ने उन्हें इस कारोबार के बंद हो जाने की बात कही। लेकिन इन सब के बावजूद उन्होंने कभी हौसला नहीं खोया और आज गाँव से युवाओं का पलायन रोकने के लिए श्‍वेता ट्रेनिंग प्रोग्राम तक भी आयोजित कर रही हैं। इस प्रोग्राम में कोई भी व्‍यक्ति जाकर बकरी पालन से लेकर डेयरी और मुर्गी पालन समेत अन्‍य चीजों के बारे में जानकारी हासिल कर सकता है।
राज्य समीक्षा के ज़रिये हमारी कोशिश रहती है कि हम ऐसे युवाओं का नाम और उनके आइडियाज़ को अपने पाठकों तक पंहुचाये ताकि किसी उत्तराखंडी को अपना पहाड़ फिर से आबाद करने की राह मिल सके। इस पोस्ट के ज़रिये हमारा श्‍वेता तोमर और उन जैसे युवाओं को सलाम जो पलायन की समस्या को धता बताते हुए अपने दम पर कुछ कर-गुजरने का दिल और दिमाग रखते हैं।


Uttarakhand News: shweta tomar defeats decampment by goat farming

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