उत्तराखण्ड आन्दोलन से मिला राज्य ... क्या "गैरसैण राजधानी" आन्दोलन हो रहा जरूरी ?

उत्तराखण्ड आन्दोलन से मिला राज्य ... क्या "गैरसैण राजधानी" आन्दोलन हो रहा जरूरी ?

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उत्तराखण्ड का 1937 से पहले अपना स्वतंत्र आस्तित्व था. ब्रितानी हुकूमत द्वारा अवध, आगरा और उत्तराँचल को मिला कर 1 अप्रैल 1937 को संयुक्त कर दिया गया और नाम रखा गया United Provinces यानी संयुक्त प्रांत. 1950 में राज्य पुनर्गठन आयोग द्वारा इसे नाम दिया गया उत्तरप्रदेश. उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों की संस्कृति, स्वभाव, रहन-सहन और आर्थिक-व्यवस्था उत्तरप्रदेश से एकदम भिन्न थी. उत्तर प्रदेश का अधिकाँश भाग मैदानी जबकि उत्तराखण्ड का अधिकाँश भूभाग पर्वतीय है, तो स्वाभाविक बात है कि दोनों प्रदेशों की अर्थव्यवस्थाओं को चलाने के लिए अलग-अलग प्रकार की सोच, योजनायें एवं योजनाओं के भिन्न प्रकार से क्रियान्वयन की आवश्यकता थी. अविभाजित उत्तरप्रदेश में इसी वजह से उत्तराखण्ड विकास की दौड़ में पिछड़ रहा था और इसीलिए एक अलग हिमालयी प्रदेश की मांग उठी और 9 नवम्बर 2000 को कड़े संघर्षों के बाद उत्तरप्रदेश से उत्तराखण्ड को अलग कर दिया गया. उत्तराखण्ड प्रदेश के 13 जनपदों में से 10 का पर्वतीय क्षेत्र होने और प्रदेश के कुल क्षेत्रफल का 70 प्रतिशत से अधिक भूभाग पर्वतीय होने के कारण यह भी स्वाभाविक ही था कि इस हिमालयी प्रदेश की राजधानी पर्वतीय क्षेत्र में हो.

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उत्तराखण्ड आन्दोलन के समय से ही गढ़वाल और कुमायूं के बीच में बसे खूबसूरत गैरसैण को ही राजधानी माना गया था. उत्तराखण्ड आन्दोलन के समय प्रचलित नारों - "और कहीं मंजूर नहीं, गैरसैण अब दूर नहीं" और "पहाड़ की राजधानी पहाड़ में" से भी यह स्वतः ही एक जन-संस्वीकृत राजधानी बन गयी थी. हर एक पहाड़ी, जिसने उत्तराखण्ड आन्दोलन में प्रतिभाग किया, को पूर्ण विश्वास था कि उत्तराखण्ड राज्य बनने के साथ ही गैरसैण ही राजधानी होगी. बल्कि उत्तराखण्ड क्रान्ति दल (उक्रांत) ने तो गैरसैण के आस पास के क्षेत्र को भी प्रदेश की राजधानी-क्षेत्र में मिलकर गैरसैण का नाम पेशावर विद्रोह के महानायक उत्तराखंडी वीर चंद्रसिंह गढ़वाली के नाम पर "चंद्रनगर गैरसैण" करने का सुझाव दिया. परन्तु एक बार फिर भोलेभाले पहाड़ियों को यह आभास तक नहीं हुआ कि तत्कालीन भाजपा सरकार ने देहरादून को अस्थायी राजधानी बनाकर उत्तराखण्ड की राजधानी के मुद्दे को कभी ना सुलझने वाले पाश में कैद कर दिया है. अन्यथा सोचने वाली बात है कि राज्य बनने के 17 वर्षों के बाद भी उत्तराखण्ड प्रदेश को एक अदद "स्थायी-राजधानी" क्यूँ नहीं मिल पा रही है ? आखिर देहरादून ही उत्तराखण्ड की "अस्थायी" राजधानी घोषित क्यूँ है ?

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11 जनवरी 2001 को कांग्रेस और भाजपा नेताओं द्वारा "राजधानी आयोग" का मिलजुल कर गठन किया गया, तब से अभी तक 12 बार इस "राजधानी आयोग" के कार्यकाल को बढाया जा चुका है. इस बीच भाजपा और कांग्रेस दोनों की सरकारें रही हैं. यदि उत्तराखण्ड के निर्माण के साथ ही राजनेताओं द्वारा प्रदेश का भला सोचते हुए गैरसैण को राजधानी बना दिया होता तो उत्तराखण्ड में विकास "पहले मैदानों में फिर पहाड़ों में" ना होकर "पहले पहाड़ों में फिर मैदानों में" होता. क्या हमारे नेता उत्तराखण्ड के नहीं हैं ? अगर हैं तो क्यूँ बाबा मोहन उत्तराखंडी को यूँ ही मरने दिया गया ? बाबा मोहन उत्तराखंडी जिन्होंने गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग को लेकर 2 जुलाई 2004 को गैरसैंण के निकट बेनिताल में आमरण अनशन प्रारम्भ किया व 38 दिन बाद 8 अगस्त 2004 को शहीद हो गये. क्या हमारे पहाड़ी राजनेता इतने संवेदन-हीन हो गए हैं कि हमारे अपनों की शहादत भी हमारे राजनेताओं का देहरादून-मोह भंग नहीं कर पा रही ?

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यदि उत्तराखण्ड की राजधानी गैरसैण होती तो राज्य के 10 पर्वतीय जनपद इन 17 वर्षो में उद्योग-शून्य नहीं रहते और उत्तराखण्ड का नौजवान आज 17 वर्षो के बाद भी पलायन की त्रासदी से अभिशप्त न होता. गैरसैंण राजधानी का मतलब होता तेजी से खाली हो रहे पहाड़ी गाँवों में स्थायित्व तथा सीमान्त क्षेत्रों में जीवन्तता व विकास की निरन्तरता, जो कि उत्तराखण्ड राज्य के हित में होता. स्थायी राजधानी बनाये जाने की राह में लगातार चल रही पैंतरेबाजी में अब गैरसैण राजधानी निर्माण को लेकर खर्च होने वाले धन का रोना शुरु हो गया है. यह भी सुनने में आता है कि राज्य की राजधानी का न सिर्फ आधारभूत ढांचा बल्कि सभी आवश्यक निर्माण देहरादून में कर लिए गये हैं तो अब गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने का प्रश्न ही कहाँ रह गया है. ये लोकतन्त्र का अजब तमाशा है.. यहाँ सरकार अपने आप पर ही पर आरोप लगा रही है. पिछली सरकार के एक महान मंत्री देहरादून के स्थायी राजधानी होने की लगभग घोषणा करते हुए कह रहे थे कि गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने के लिए पाँच हजार करोड़ रुपये चाहिए, वे कहाँ से आयेंगे? केन्द्र तो दे नहीं रहा. राज्य के अपने इतने संसाधन हैं नहीं.. इसलिए स्थायी राजधानी तो देहरादून ही होगी. वर्तमान डबल-इंजन सरकार के पास तो इस प्रकार का कोई बहाना नहीं होना चाहिए. बहरहाल लगता है कि उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन के बाद "गैरसैण राजधानी" आन्दोलन आवश्यक होता जा रहा है.
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क्रमशः ...


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