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Image: Khuda pooja in uttarakhand

अद्भुत उत्तराखंड: यहां शिवजी की ‘खुदा पूजा’ होती है, मुगल शासनकाल से जुड़ी कहानी !

अद्भुत उत्तराखंड: यहां शिवजी की ‘खुदा पूजा’ होती है, मुगल शासनकाल से जुड़ी कहानी !

वो भगवान शिव के भक्त हैं, पूरे गांव में इन दिनों ये पूजा की जाती है। लेकिन बड़ी हैरतंगेज बात ये है कि इस पूजा का नाम खुदा पूजा रखा गया है। आखिर ऐसा क्यों है ? उत्तराखंड में होने वाली उस पूजा का इतिहास क्या है, जरा ये भी जान लीजिए। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में चीन सीमा से लगी मुनस्यारी तहसील। मुनस्यारी तहसील के दर्जनों गांवों में ये पूजा की जाती है। भगवान शिव के प्रति आपको अगाढ़ श्रद्धा देखनी है, तो मुनस्यारी चले आएं। इस पूजा में भगवान शिव के अलखनाथ रूप की पूजा होती है। कहा जाता है कि ये पूजा विषम वर्षों में होती है, लेकिन कुछ गांवों में हर 12 साल में ये पूजा होती है। इस बार ये पूजा यहां सोमवार से शुरू हुई है। अब सवाल ये है कि यहां भगवान शिव की पूजा का नाम खुदा पूजा क्यों दिया गया है।

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अलग अलग धारणाएं जरूर हैं, लेकिन एक धारणासबसे ज्यादा प्रचलित है। कहा जाता है कि मुगल शासनकाल में जब स्थानीय लोग भगवान अलखनाथ की पूजा कर रहे थे, तो मुगलों की नजर उन पर पड़ी। मुगलों द्वारा जब सवाल पूछा गया, तो ग्रामीणों ने खुदा की पूजा करने की बात कही। कहा जाता है कि तब से इसका नाम खुदा पूजा ही रहा। चार सदियां बीत चुकी हैं और भगवान अलखनाथ की पूजा लगातार चली आ रही है। अब ये भी जान लीजिए कि ये पूजा किस तरह से होती है। अलग अलग गांवों में ये पूजा कभी तीन दिन, कहीं सात दिन और कुछ गांवों में 22 दिनों तक होती है। खास बात ये है कि खुदा पूजा रात के अंधेरे में होती हैा। जिस मकान में ये पूजा होती है उसकी छत का एक हिस्सा खोल दिया जाता है। कहा जाता है कि छत के इसी खुले हिस्से से भगवान अलखनाथ पूजा में आते हैं।

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पूजा के शक्तिस्थल पर कपड़े का पर्दा लगाया जाता है। इसके पूछए भी एक वजह है। अलखनाथ को भगवान शिव का रूप माना जाता है। वो एकांत में शुचिता वाले स्थान पर रहना पसंद करते हैं। इस पूजा की कुछ और भई खास बातें हैं। खुदा पूजा के दौरान पद्म वृक्ष को न्यौता दिया जाता है। जब स्थानीय लोग पदम के वृक्ष को न्यौता देने उसके पास जाते हैं, तो वहां मेला लगता है। जागरण के दिन पदम वृक्ष की टहनियों को गाजे बाजे के साथ पूजा स्थल तक लाया जाता है। इस दिन रात में चार बार महाआरती का आयोजन होता है। अगले दिन सुबह विशाल भंडारा होता है। कुल मिलाकर कहें तो उत्तराखंड में आपको पग पग पर अलग अलग कहानियां सुनने को मिलती हैं। इनमें से एक कहानी खुदा पूजा की भी है। आजकल मुनस्यारी इस उत्सव में रंगा हुआ है।

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