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Image: Brahma kamal in danger

खतरे में उत्तराखंड की सबसे अमूल्य धरोहर, अभी नहीं जागे तो नामो-निशां मिट जाएगा !

खतरे में उत्तराखंड की सबसे अमूल्य धरोहर, अभी नहीं जागे तो नामो-निशां मिट जाएगा !

सिर्फ हिमालय, उत्तरी बर्मा और दक्षिण-पश्चिम चीन में ये बेशकीमती फूल पाया जाता है। इस पुष्प का नाम है ब्रह्म कमल। धार्मिक और प्राचीन मान्यता के मुताबिक ब्रह्म कमल को इसका नाम ब्रह्मदेव के नाम पर मिला है। इसका वैज्ञानिक नाम साउसिव्यूरिया ओबलावालाटा (Saussurea obvallata) है। ब्रह्मकमल एस्टेरेसी कुल का पौधा है। सूर्यमुखी, गेंदा, गोभी, डहलिया, कुसुम और भृंगराज इसके ही परिवार के पुष्प कहे जाते हैं। ब्रह्मकमल सामान्य कमल की तरह पानी में नहीं उगता, बल्कि जमीन पर उगता है। पूजा-पाठ के उपयोग में आने वाला औषधीय गुणों से युक्त ये दुर्लभ पुष्प तीर्थयात्रीयों द्वारा अत्यधिक दोहन से लुप्त होने की कगार पर ही पहुँच गया है। इसके साथ ही इस बारे में कुछ खास बातें बताई गई हैं।

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इसके अंधाधुँध दोहन के चलते इसका अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है। इनकी कमी के चलते बद्रीधाम मंदिर समिति ने उत्तराखंड सरकार से इनके संरक्षण के लिए गुहार भी लगाई थी। अब यक्ष प्रश्न ये है कि आखिर इस कीमती धरोहर को बचाने के लिए सरकार क्या नया कदम उठाएगी ? इसके साथ ही वैज्ञानिकों का कहना है कि उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में जैसा वातावरण ब्रह्म कमल को मिलता है, अब उसमें भी गंभीर बदलाव आ रहे हैं, जिससे इसके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। सामान्य तौर पर ब्रह्मकमल हिमालय के पहाड़ी ढलानों या 3000-5000 मीटर की ऊंचाई पर उगता है। इसकी सुंदरता और दैवीय गुणों से प्रभावित हो कर ब्रह्मकमल को उत्तराखंड का राज्य पुष्प भी घोषित किया गया है। वर्तमान में भारत में इसकी करीब 60 प्रजातियों की पहचान की गई है।

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भारत के अन्य भागों में इसे और भी कई नामों से पुकारा जाता है। हिमाचल में इसे दूधाफूल, कश्मीर में गलगल और उत्तर-पश्चिमी भारत में बरगनडटोगेस कहा जाता है। साल में एक बार खिलने वाले गुल बकावली को भी कई बार भ्रमवश ब्रह्मकमल मान लिया जाता है। माना जाता है कि ब्रह्मकमल के पौधे में एक साल में केवल एक बार ही फूल आता है जो कि सिर्फ रात्रि में ही खिलता है। दुर्लभता के इस गुण की वजह से इसे शुभ माना जाता है। इस फूल की मादक सुगंध का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है।कहा जाता है कि द्रौपदी इसे पाने के लिए व्याकुल हो गई थी। पिघलते हिमनद और उष्ण होती जलवायु की वजह से इस दैवीय पुष्प पर संकट के बादल पहले ही गहरा रहे थे। भक्ति में डूबे श्रद्धालुओं द्वारा केदारनाथ में ब्रह्मकमल का अंधाधुँध दोहन भी इसके अस्तित्व के लिए खतरा बन गया है।

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