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Image: Perls could be grown in ponds and lakes in Uttarakhand says report

उत्तराखंड के तालाब सच में उगलेंगे मोती, वैज्ञानिकों की बड़ी रिसर्च में बड़ा खुलासा

उत्तराखंड के तालाब सच में उगलेंगे मोती, वैज्ञानिकों की बड़ी रिसर्च में बड़ा खुलासा

देहरादून पहुंचे वैज्ञानिक डॉ. अजय कुमार सोनकर ने प्रदेश मान वाटर पर्ल कल्चर से पानी को साफ करने के साथ ही पर्यटन को भी बढ़ावा मिलने के सम्बन्ध में बड़ा खुलासा करते हुए कहा है कि उत्तराखण्ड के तालाब और झीलों में तकनीक का प्रयोग कर मोतियों का उत्पादन किया जा सकता है। डॉ. अजय कुमार सोनकर की मानें तो अब उत्तराखण्ड के तालाब और झील मोती तो उगलेंगे ही साथ ही उत्तराखण्ड के शहरी छेत्रों में प्रदूषण भी कम किया जा सकेगा। समुद्री मोतियों के विशेषज्ञ वैज्ञानिक डॉ. अजय कुमार सोनकर ने देहरादून पहुंचकर इसकी संभावनाएं तलाशी हैं। डॉ. अजय कुमार सोनकर ने कहा कि फ्रेश वाटर पर्ल कल्चर (सीप से मोती बनाना) से पानी को साफ करने के साथ ही पर्यटन को भी बढ़ावा दिया जा सकता है। विदेशों में भी इस तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। झीलों और तालाबों के पानी की तलहटी में पाए जाने वाली विभिन्न प्रजाति की सीप सारा जीवन पानी के प्रदूषण को समाप्त करने के लिए सतत क्रियाशील रहती हैं।

सीप से मोती बनाने की प्रक्रिया के बारे में डॉ० सोनकर ने बताया कि सबसे पहले सीप में जीन सिक्रेशन तैयार किया जाता है और उसके बाद सीप में मोती बनने की प्रक्रिया शुरू होती है। सीप का ऑपरेशन कर कैल्शियम कार्बोनेट की परत बनाई जाती है, कैल्शियम कार्बोनेट की आगे चलकर समय के साथ मोती बनता है। जिस आकार की कैल्शियम कार्बोनेट बॉडी डाली जाती है, उसी आकार का मोती बनता है। सीप की उम्र जब तीन साल हो जाती है तो उसमें मोती तैयार होता है। सीप की अधिकतम आयु छह साल होती है। इस तरह सीप की खेती शुरू करने से पहले किसान को हर सीप में शल्य क्रिया करके उसके अंदर छोटा सा कैल्शियम कार्बोनेट का नाभिक या ऊतक रखना होता है। और उसके बाद सीप को बंद कर दिया जाता है। ऊतक से निकलने वाला पदार्थ नाभिक के चारों ओर जमने लगता है और अंत में मोती का रूप ले लेता है। इसके बाद सीप को खोलकर मोती निकाल लिया जाता है और उसका उपचार कर दिया जाता है।

सीपों द्वारा पानी साफ़ करने की विशेषता के बारे में डॉ० सोनकर कहते हैं कि फ्रेश वाटर पर्ल कल्चर (सीप से मोती बनाना) से पानी को साफ करने के साथ ही पर्यटन को भी बढ़ावा दिया जा सकता है। साथ ही वर्तमान में विदेशों में खासकर चीन में भी इस तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। पानी के निचले हिस्से में पाए जाने वाली विभिन्न प्रजाति की सीप अपना सारा जीवन पानी के प्रदूषण को समाप्त करने के लिए सतत क्रिया करते रहती हैं। एक सीपों की कॉलोनी 30 से 100 मिलियन गैलन पानी को प्रतिदिन प्रदूषण मुक्त करती है। फ्रे श वाटर कल्चर, पर्यटन को बढ़ावा देने में भी सहायक सिद्ध हो रहा है। डॉ. सोनकर ने बताया कि भारत का मोती बाजार चीनी बाजार से प्रभावित है।

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