Video: देवभूमि का ये नजारा देख दुनिया हुई नतमस्तक, मां नंदा की ऐतिहासिक शोभायात्रा

Video: देवभूमि का ये नजारा देख दुनिया हुई नतमस्तक, मां नंदा की ऐतिहासिक शोभायात्रा

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झमाझम बारिश के बीच आस्था का ऐसा सैलाब आपने पहली बार देखा होगा। ये वीडियो साबित कर रहा है कि आज भी उत्तराखंड में आस्था दुनिया के लिए चुनौती बनी है। बारिश के बाद भी मां नंदा सुनंदा की शोभायात्रा में एक बार फिर भक्तों का सैलाब उमड़ा। इस मौके पर भक्तों ने अपनी कुल देवी को नम आंखों से विदाई दी। पहले नयना देवी मंदिर में सुबह पूजा अर्चना की गई। इसके बाद डोली ने मंदिर की परिक्रमा की और फिर शुरू हुई नगर परिक्रमा। भक्तों ने अक्षत फूलों से मां से आशीर्वाद मांगा। इस मौके पर पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज, सांसद भगत सिंह कोश्यारी ने भी मंदिर पहुंचकर मां की पूजा अर्चना की। मां की विदाई के वक्त हर आंख नम हो गई। सड़कों के दोनों तरफ हजारों की संख्या भीड़ डोली के इंतजार में डटी है। बताया जाता है कि नंदा महोत्सव 114 सालों से मनाया जा रहा है।

1903 में सबसे पहला नंदा देवी महोत्सव मनाया गया। ये महोत्सव ना सिर्फ नैनीताल बल्कि गढ़वाल के कुछ हिस्सों में भी मनाया जाता है। कुछ संस्कृति प्रेमी कहते हैं कि नंदा महोत्सव का उत्तराखंड के ऐतिहासिक नंदा राजजात से भी संबंध है। इतिहासकार कहते हैं कि अल्मोड़ा के चंद्रवंशी सम्राट राजा बाज बहादुर चंद ने साल 1655 में गढ़वाल की पिंडर घाटी पर आक्रमण किया था। इस दौरान जूनागढ़ किले से नंदा की मूर्ति को उठाई गई थी। इस मूर्ति को अल्मोड़ा में स्थआपित किया गया था। कुछ लोग इसे कुमाऊं के राजवंश से भी जोड़ते हैं। कहा जाता है कि नंद राजा की दो बहिनें नंदा और सुनंदा थीं। इन दिनों नैनीताल के अलावा भवाली, बिन्दुखत्ता, अल्मोड़ा, रानीखेत, गरूड़ बैजनाथ स्थित कोट भ्रामरी समेत गढ़वाल मंडल के कई जगहों में नंदा महोत्सव मनाया जाता है।

पूरे मंडल के लोगों के अलावा बाहर से भी लोग नंदा महोत्सव में शामिल होते हैं। ये महोत्सव भादों महीने की पंचमी से शुरू होता है। इस महाउत्सव के लिए सबसे पहले कदली वृक्ष लाया जाता है। केले के छिलकों से मां नंदा-सुनंदा की मूर्ति बनाई जाती है। इसके बाद अष्टमी के दिन प्राण प्रतिष्ठा की जाती है। इसके बाद सुबह से ही मंदिरों में भीड़ शुरू हो जाती है। भक्त अपनी आराध्य देवी के दर्शन करते हैं और पूजापाठ करते हैं। इस दिन उत्तराखंड में विश्व के कल्याण के लिए विशेष पूजा की जाती है। दशमी को दर्शनों के बाद मां का डोला उठाया जाता है। इस डोली को पूरे शहर में घुमाया जाता है। शाम को इसे विसर्जन के बाद महोत्सव का समापन हो जाता है। अब आप ये वीडियो देखिए, जिससे आपको अहसास होगा कि आप सच में देवों की भूमि में हैं।


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