देवभूमि में दक्षिण भारत से आए एक महर्षि, फिर बना ये चमत्कारी मंदिर !

देवभूमि में दक्षिण भारत से आए एक महर्षि, फिर बना ये चमत्कारी मंदिर !

Story of agastya muni temple - उत्तराखंड न्यूज, अगस्त्य मुनि, uttarakhand news, a,उत्तराखंड,

आज हम आपको उत्तराखंड के एक अद्भुत मंदिरों में से एक अगस्यमुनि मंदिर के बारे में बता रहे हैं। अगस्त्यमुनि मन्दिर उत्तराखण्ड के अगस्त्यमुनि शहर में है। पुराना मन्दिर दक्षिण भारतीय शैली में बना है। बाद में यहां पुनरुद्धार किया गया गया और मंदिर का स्वरूप बदला गया । मुख्य मन्दिर में अगस्त्य ऋषि का कुण्ड और उनके शिष्य भोगाजीत की प्रतिमा है। इसके साथ ही अगस्त्य ऋषि के इष्टदेव अगस्त्येश्वर महादेव का मन्दिर भी यहां पर है। दक्षिण की ओर जाने से पहले महर्षि अगस्त्य उत्तर भारत में उत्तराखण्ड की यात्रा पर आये थे। यहां पर ऋषि अगस्त्य नागकोट नाम की जगह पर रुके थे। यहां पर ऋषि ने सूर्य भगवान और श्रीविद्या की उपासना की थी। कहा जाता है कि इस वक्त कई स्थानीय राजा महर्षि के शिष्य बन गये। इन राजाओं में कर्माजीत और शील जैसे राजा भी शामिल थे। इस मंदिर में आज भी एक त्रिशूल है, जो उंगली के स्पर्श से हिलता है।

इस त्रिशूल को अगर आप हाथ से पकड़ने की कोशिश करेंगे तो ये टस से मस नहीं होता। कहा जाता है कि महर्षि अगस्त्य ने ही अगस्त्यमुनि के सिल्ला नामक जगह से लोगों को आतापी और वातापी नामक दैत्यों से निजात दिलाई थी। ये महर्षि की मूल तपस्थली थी, जहाँ पर पुराने वक्त में मन्दिर था। ये वर्तमान मन्दिर से करीब आधा किलोमीटर दूर है। कहा जाता है कि हजारों साल पहले यहां एक बाढ़ आई थी, जिसमें ये मंदिर बह गया था। इसके बाद किसी स्थानीय निवासी को स्वप्न हुआ, जिसमें ऋषि अगस्त्य कह रहे थे कि वो यहीं पर नये स्थान पर आ गए हैं। स्वप्न में जिस जगह का जिक्रा किया गया था, वहां आज कुंड है। बाढ़ में बही महर्षि की मूल प्रतिमा का पता नहीं चला। महर्षि के शिष्य भोगाजीत की तांबे की प्रतिमा को यहां कुण्ड के ठीक साथ में स्थापित किया गया है।

कहा जाता है कि यहां बहुत साल पहले मन्दिर के पुजारी का देहान्त हो गया । इसके बाद यहां पूजा बंद हो गई थी। उसी वक्त दक्षिण से दो आदमी उत्तराखण्ड की यात्रा पर आये हुये थे। उन्हें अगस्त्य ऋषि के मन्दिर के बारे में पता लगा तो वो मन्दिर में दर्शन को आये। स्थानीय लोगों ने उन्हें मना किया के मन्दिर के अन्दर ना जाएं। लोगों का कहना था कि जो भी मंदिर के अंदर जा रहा है, उसकी मृत्यु हो जाती है। लोगों ने कहा कि पूजा बन्द है और जो अन्दर जा रहा है उसकी मौत हो रही है। लोगों ने कहा कि अगस्त्य ऋषि तो उनके देवता हैं और वो हर हाल में दर्शन करेंगे। वो अन्दर गये, दर्शन किया और उनको कुछ भी नहीं हुआ। इसके बाद लोगों ने उन्हें ही मन्दिर में पूजा व्यवस्था सम्भालने का अनुरोध किया। इसके बाद वो यहां के पुजारी हो गए। इन्होंने बेंजी नामक गाँव बसाया। तब से अगस्त्यमुनि मन्दिर में ग्राम बेंजी से ही पुजारी होते हैं।


Uttarakhand News: Story of agastya muni temple

Content Disclaimer (Show/Hide)
लेख शेयर करें