उत्तराखंड के दो जांबाज, कारगिल युद्ध के हीरो..16 दिन तक खाना छोड़कर लड़ी थी जंग

कारगिल युद्ध में उत्तराखंड के इन दो जांबाजों ने अदम्य शौर्य का प्रदर्शन किया था, जानिए इनकी कहानी...

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युद्ध् अपने पीछे तबाही के जो निशान और भयावह यादें छोड़कर जाते हैं, वो कभी पीछा नहीं छोड़ते। कारगिल युद्ध के दौरान वहां तैनात जवानों ने जो परेशानियां सहीं, जो भयानक मंजर देखे, उनकी यादें 20 साल बाद भी उन्हें डराती हैं। हालांकि देश के दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब देने का जज्बा उनमें आज भी दिखाई देता है। कारगिल युद्ध में वीरता और अदम्य शौर्य का प्रदर्शन करने वाले जवानों की यही कहानियां हमें प्रेरणा देती हैं, हमें अहसास कराती हैं कि देश सुरक्षित हाथों में है। देहरादून के रहने वाले हवलदार राजेश मल्ल और अरविंद सिंह भी कारगिल युद्ध से ऐसी ही कहानियां लेकर लौटे थे। युद्ध का जो मंजर उन्होंने बयां किया, उसे सुनकर आज भी कलेजा कांप उठता है। क्या आप जानते हैं कि इन जवानों ने कारगिल युद्ध में 16 दिन तक बिना खाना खाए जंग लड़ी थी। कारगिल वॉर के वक्त अरविंद और राजेश गोरखा राइफल्स का हिस्सा थे। वॉर शुरू होते ही उनकी बटालियन को कश्मीर बुला लिया गया। वहां पहुंचकर उनका सामना सबसे पहले उन गाड़ियों से हुआ, जिनमें उनके साथियों की लाशें रखी थीं। साथियों का ये हश्र देख राजेश और अरविंद का खून खौल उठा। आगे पढ़िए

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अब दोनों ने ठान लिया कि चाहे जो हो जाए पाकिस्तान को सबक सिखाए बिना नहीं छोड़ेंगे। युद्ध के दौरान उन्हें कई-कई दिन तक खाना नहीं मिलता था। हर तरफ सन्नाटा था और ये सन्नाटा केवल गोलियों, बम-बारूद के धमाकों से ही टूटता था। छिपने के लिए बंकर तक नहीं थे। हवलदार अरविंद सिंह और राजेश मल्ल उन चंद खुशकिस्मत लोगों में से थे, जिन्हें युद्ध के बाद उनके परिवार के पास वापस लौटने का मौका मिला। कारगिल युद्ध हुए 20 साल हो गए हैं, लेकिन इसकी यादें अब भी उनके जहन में ताजा हैं। वो कहते हैं कि एक जवान के लिए देश सर्वोपरी होता है। वो देश के लिए अपनी जान देने से पीछे नहीं हटते। इसीलिए जैसा सम्मान उन्हें कारगिल वॉर के दौरान मिला, वही सम्मान हमेशा मिलना चाहिए। धन्य है देवभूमि उत्तराखंड जो कि गौरवशाली सैन्य परंपरा का निर्वहन करती रही है। देशसेवा का ये जज्बा हमेशा कायम रहना चाहिए।


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