देवभूमि में खेती की हालत देखकर हाईकोर्ट भी हैरान, किसानों के हक में कही बड़ी बातें

देवभूमि में खेती की हालत देखकर हाईकोर्ट भी हैरान, किसानों के हक में कही बड़ी बातें

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उत्तराखंड में खेती को लेकर चौकाने वाले आकड़ें सामने आए है। हाईकोर्ट ने पर्वतीय जिलों के किसानों के भूमिधरी अधिकार से संबंधित निर्णय में पहाड़ों में तेजी से कम हो रही खेती पर भी खासी चिंता जताई है। कोर्ट ने कहा है कि प्रदेश में खेती का रकबा और खेतिहर मजदूरों की तादाद में लगातार गिरावट आ रही है जबकि पर्वतीय क्षेत्र में 90 फीसदी लोग खेती पर निर्भर हैं। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश राजीव शर्मा और जस्टिस मनोज तिवारी की बेंच ने कहा कि कृषि को बचाने के लिए आवश्यक कदम उठाने की जरुरत है। कोर्ट के मुताबिक किसानों को फसल की उचित कीमत सही समय पर दी जाए और कर्ज के कारण आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों को पेंशन दी जानी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि प्रदेश में इन सब कारणों से लगातार किसान पलायन कर रहे है। अब जरा अपने अपने जिले का हाल भी जानिए।

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ये स्थिति कितनी गंभीर हो चुकी है। कोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक पर्वतीय क्षेत्र से पलायन करने वाले किसानों की संख्या दो लाख 26 हजार 950 हो चुकी है। बीते सालों में अल्मोड़ा से 36401, पौड़ी से 35654, पिथौरागढ़ से 22936, देहरादून से 20625, चमोली से 18536, नैनीताल से 15075, उत्तरकाशी से 11710, चंपावत से 11281, टिहरी से 33689, रुद्रप्रयाग से 10970 और बागेश्वर से 10073 किसान पलायन कर चुके हैं। बता दें कि प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्र में मात्र 20 फीसदी कृषि भूमि है और 80 फीसदी अप्रयुक्त है या बेची जा चुकी है। इस 20 प्रतिशत कृषि भूमि में भी मात्र 12 प्रतिशत सिंचित है और 08 फीसदी बारिश पर निर्भर है। इस पर भी जो खेती हो पाती है उसे जंगली जानवर नष्ट कर देते हैं और रही बची फसल की उचित कीमत नहीं मिल पाती। इस सबके चलते 1951 में जहां कृषि क्षेत्र में 50 प्रतिशत मजदूर कार्यरत थे 2011 में मात्र 24 प्रतिशत कृषि मजदूर थे।


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