‘रावत’ कौन हैं ? जानिए उत्तराखंड के इन राजपूतों की कहानी, गौरवशाली है ये इतिहास

‘रावत’ कौन हैं ? जानिए उत्तराखंड के इन राजपूतों की कहानी, गौरवशाली है ये इतिहास

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इतिहासकारों ने " रावत " का संधि विच्छेद ईस प्रकार किया हैं। रा मतलब राजपुताना, व मतलब वीर और त मतलब तलवार। इसका सीधा मतलब है कि बलशाली, पराक्रमी, क्षत्रिय शूरवीर जो तलवार के धनी हैं, वे रावत- राजपूत कहलाते हैं | ये रावतों को एक पदवी मिली है। जो 10 हाथियो की सेना से मुकाबला करने वाले राजपूत शूरवीर योध्दा को प्रदान की जाती थी। इस पदवी का मतलब राजपुत्र ,प्रधान, प्रतापी शूरवीर, पराक्रमी योध्दा होता है। रावत की पदवी की गरिमा को किसी ने इस तरह से बखान किया है। ‘’सौ नरों एक सूरमा, सौ शूरों एक सामन्त, सौ सामन्त के बराबर होता है, एक रावत राजपूत। इतिहासकार बताते हैं कि रावत शब्द राजपुत्र का ही अपभ्रंश है । राजपूत काल मे रावत जाति न होकर चौहान, गहलौत, परमार,सिसोदिया, पवाँर, गहड़वाल आदि राजघरानो में पराक्रमी शासक वर्ग की पदवी थी, जो दरबार में सम्मान और बड़प्पन का सूचक होती थी।

इन राजघरानो में रावत पदवी से सम्मानित शूरवीर रावत-राजपूत कहलाते थे। ये रावत ही थे जो क्षत्रियों में अपनी विशेष पहचान रखते थे । कहा जाता है कि राजस्थान में रावत की पदवी अनूपवंशीय बरड़ राजपूतो में सबसे पहले वीहल चौहान राजपूत सरदार को मिली थी। उनके पराक्रम पर मेवाड़ दरबार में रावल जैतसी द्वारा ये उपाधि दी गई थी। इसके लिए उन्हें 10 गांवो का गढ़बौर यानी चारभुजा राज्य दिया गया था। रावत-राजपूत स्वाभिमान के धनी रहे है। रावत-राजपूतों ने अपना सिर कटाना स्वीकार कर लिया पर पराधीनता कभी भी पसन्द नहीं की, जिसका एक गौरवमयी इतिहास रहा है। 1832 में फ्रांस के प्राकृतिक वेता मि. जेक्मेन्ट ने रावत राजपूतों के लिए लिखा था कि " No Rajput Chief No Mughal Emperor had ever been able to sub-due them, Merwara always remained independant."

इसका मतलब है कि न तो कोई राजपूत राजा,ना ही कोई मुगल सम्राट इन्हें अपने वश में कर पाया। इन राजपूतों का राज्य हमेशा आज़ाद रहा। कहा जाता है कि उत्तराखंड में रावत राजपूत राजस्थान के राजपूताना परिवारों से ही आए थे। नैन सिंह रावत, जनरल बिपिन रावत, त्रिवेंद्र सिंह रावत जैसे ये बड़े नाम हैं, जिन्होंने अपने तेज से हर किसी को अपनी तरफ आकर्षित किया है। गढ़वाल के 52 गढ़ों में से कई गढ़ों पर रावत जाति का राज रहा है। मुंगरा गढ़ की बात करें तो रवाई स्थि​त ये गढ़ रावत जाति का था और यहां रौतेले रहते थे। इसके अलावा रामी गढ़ पर भी रावतों का ही राज रहा था। बिराल्टा गढ़ भी एक ऐसा गढ़ है जहां रावत जाति के राजाओं ने राज किया था। रावत जाति के इस गढ़ का अंतिम थोकदार भूपसिंह था। ये जौनपुर में था। इसके अलावा कांडा गढ़ जो कि रावतस्यूं में था। इस पर भी रावत जाति का था।


Uttarakhand News: Story of rawat

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