किसने किया था मसूरी का नामकरण ? हर दिन 12 बजे क्यों दागी जाती थी तोप ? पढ़िए...

किसने किया था मसूरी का नामकरण ? हर दिन 12 बजे क्यों दागी जाती थी तोप ? पढ़िए...

The history of mussoorie - उत्तराखंड, उत्तराखंड़ न्यूज, मसूरी

लोग कहते हैं कि नाम में क्या रखा है मगर हर नाम के पीछे कोई ना कोई कहानी जरूर होती है। आज हम आपको बताएंगे पहाड़ों की रानी की“मसूरी” नाम रखे जाने की कहानी। इस हिल स्टेशन के मसूरी नाम पड़ने की वजह तलाशने के लिए हमें इतिहास के कुछ पन्नों को पलटना होगा। मसूरी को 1800 सदी में ब्रिट‌िश म‌िल‌िट्री अध‌िकारी ने अपने एक साथी के साथ ढूंढा था। उन्होंने इसे छुट्टी ब‌ि‌ताने के ल‌िए सबसे बेहतरीन पाया और यहीं रहने का फैसला लिया। इसके बाद उन्होंने देखा क‌ि यहां पर मसूर के पेड़ बहुत ज्यादा है। इसके बाद उन्होंने ही यहां का नाम मसूरी रख द‌िया। तब से इस हिल स्टेशन को मसूरी कहा जाने लगा। देहरादून से मसूरी का रास्ता पहाड़ियों को काटकर बनाया गया है। इसलिए यहां के कई रास्ते कटावदार दिखाई देते हैं। शिवालिक की पहाड़ियों पर बसा ये शहर है तो छोटा सा मगर इसकी खूबसूरती देखने लायक है। मसूरी गंगोत्री का प्रवेश द्वार भी कहलाती है। मसूरी में घूमने के ल‌िए कई सुंदर जगह हैं। मसूरी में इंट्री करते ही मॉल रोड की मॉकेट आपको जरुर पसंद आएगी । गनहिल मसूरी की दूसरे नंबर की सर्वाधिक ऊंची चोटी है। इस गनहिल के नाम पड़ने की भी बड़ी रोचक कहानी है ।

कहा जाता है कि पुराने दिनों में समय का पता लगाने के लिए दोपहर को ठीक बारह बजे इस पहाड़ी पर रखी तोप दागी जाती थी। कुछ समय के बाद तोप हटा ली गई, तब से इसका नाम गनहिल पड़ गया। रोपवे से गनहिल पहुंचने का मजा सचमुच रोमांचक है। गनहिल में जहां एक ओर विशाल हिमालय की दूर−दूर तक फैली सफेद झिलमिलाती चोटियां दिखाई पड़ती हैं वहीं कैमल्स बैक रोड़ भी देखने लायक जगह है। कैमल्स बैक का यह रास्ता कुलरी में रिंक हाल से शुरू होकर लाइब्रेरी बाजार पर खत्म होता है। लाइब्रेरी बाजार यहां की अंग्रेजों के समय की मॉकेट है। इस रास्ते पर पहाड़ी का आकार कुछ−कुछ ऊंट की पीठ की तरह दिखाई देता है। इसलिए इस सड़क का नाम कैमल्स रोड़ पड़ गया। यहां की खास बात यह है कि पूरे रास्ते में जगह−जगह पर थकान मिटाने और प्राकृतिक दृश्यों का आनंद लेने के लिए हवा घर बने हुए हैं। लंडौर बाजार, एक मील लंबा यह बाजार पुराने समय की शान लिए हुए है।

यहां का लाल टिब्बा मसूरी की सर्वाधिक ऊंची चोटी है। यहां से दूरबीन की मदद से गंगोत्री, बदरीनाथ, केदारनाथ, नंदा देवी और श्रीकांता की चोटियों का नजारा देख सकते हैं । मसूरी से लगभग पंद्रह किलोमीटर दूर चकराता रोड़ पर कैंपटी फाल मसूरी का एक और सुंदर और बेहद की फेमस टूरिस्ट स्पॉट है। पर्वतों में से फूट कर निकलता हुआ ये झरना पांच अलग−अलग धाराओं में चालीस फुट ऊंचाई से गिरता हुआ दिखाई पड़ता है। जो मसूरी की शान के तौर पर भी जाना जाता है । साथ ही मसूरी में म्‍यूनिसिपल गार्डन एक खूबसूरत बगीचा है जो मसूरी की हैप्‍पी वैली में है। मसूरी में एक खासा आकर्षण है जो यहां एक बार आता है वो इस जगह को कभी भूल नहीं पाता और कई तो हमेशा के लिए मसूरी में रही बस जाते हैं, इसका सबसे बड़ा उदाहरण है प्रख्यात लेखर रस्किन बॉंड, जो मसूरी में 1964 से रह रहे हैं। तो इस बार पहाड़ों की रानी को करीब से जानने का प्लान बनाए और अपनी भागमभाग वाली जिंदगी से दूर, यहां की ताजगी और सूकून का एहसास करें।


Uttarakhand News: The history of mussoorie

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