उत्तराखंड का ‘अद्भुत’ मंदिर...इसे कहते हैं ‘भोलेनाथ’ की तपस्थली!

उत्तराखंड का ‘अद्भुत’ मंदिर...इसे कहते हैं ‘भोलेनाथ’ की तपस्थली!

Information about madmaheshwar-0417  - उत्तराखंड, मदमहेश्वर, Uttarakhand, Madhyameshwar

उत्तराखंड के पांच केदारों में एक है मदमहेश्वर। यहां आकर आपको लगेगा कि सच में आप भगवान भोलेनाथ के घर में हैं। बेहतरीन नजारों और खूबसूरत वादियों में बसे इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यहां भोलेनाथ अपने भक्तों की हर मनोकामना पूरी करते हैं। नवंबर महीने में यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ, तुंगनाथ, रुद्रनाथ और कल्पेश्वर के कपाट बंद हो जाते हैं बस बद्रीनाथ और मदमहेश्वर के कपाट खुले होते। मदमहेश्वर जाने के लिए रुद्रप्रयाग जिले में ऊखीमठ तक जाना होता है। रुद्रप्रयाग से बसें और जीपें मिलती हैं। ऊखीमठ में मुख्य बाजार से सीधा रास्ता उनियाणा जाता है जो आजकल मदमहेश्वर यात्रा का आधार स्थल है। उनियाणा से मदमहेश्वर की दूरी 23 किलोमीटर है जो पैदल नापी जाती है। कुछ साल पहले तक ये यात्रा मनसूना से शुरू होती थी। मनसूना ऊखीमठ और उनियाणा के बीच में है।

तब यात्री पैदल ही मनसूना से उनियाणा तक पहुंचते थे। अब उनियाणा तक तो सडक पहुंच गई है, आगे भी जाएगी। रांसी के लिए भी सडक मार्ग पर बस एक पुल बनना बाकी है, सड़क बन चुकी है। जिस दिन पुल शुरू हुआ, गाडियां उनियाना के बजाय रांसी तक जाया करेंगी। इस तरह पैदल चलने का रास्ता और कम हो जाएगा। वैसे भी रांसी उनियाणा के मुकाबले ज्यादा समृद्ध और बडा गांव है। यहां राकेश्वरी देवी का एक प्राचीन मंदिर भी है। रांसी से हल्की सी चढाई के बाद सामने दिखाई देता है गौण्डार गांव। गौण्डार तक सीधा ढलान है। घने जंगलों से होकर वहां तक पगडंडियां जाती हैं। ये इस घाटी का आखिरी गांव है। रांसी और गौण्डार के बीच में जो जंगल है, उसमें कई झरने भी हैं। गौण्डार से करीब डेढ किलोमीटर आगे आती है- खटरा चट्टी। चट्टी यात्रियों के रुकने के स्थान को कहते हैं। यहां से मदमहेश्वर की दूरी सात किलोमीटर है।

यहां से आगे निकलकर तीसरी चट्टी आती है- नानू चट्टी। कुन चट्टी के बाद रास्ता जंगल में घुस जाता है और मदमहेश्वर से आधे किलोमीटर पहले तक जंगल में ही रहता है। ये जगह समुद्र तल से लगभग 3300 मीटर की ऊंचाई पर है। मदमहेश्वर के पास ही एक चोटी है। इसका रास्ता कम ढलान वाला है। पेड भी नहीं हैं। एक तरह का बुग्याल है। उस चोटी को बूढा मदमहेश्वर कहते हैं। डेढ-दो किलोमीटर चलना पडता है। जैसे-जैसे ऊपर चढते जाते हैं तो चौखंबा के दर्शन होने लगते हैं। बिल्कुल ऊपर पहुंचकर महसूस होता है कि हम दुनिया की छत पर पहुंच गए हैं। दूर ऊखीमठ और गुप्तकाशी भी दिखाई देते हैं। चौखंभा चोटी तो ऐसे दिखती है मानो हाथ बढाकर उसे छू लो। कुल मिलाकर कहें तो इस जगह पर आकर आपको दिल से बेहतरीन अनुभूति प्राप्त होती है। आपको यकीन होगा कि आप सच में देवभूमि में मौजूद हैं।


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